khol apne hi paron ko aasmaañ bhi paas hai | खोल अपने ही परों को आसमाँ भी पास है

  - Manohar Shimpi

खोल अपने ही परों को आसमाँ भी पास है
मंज़िल-ए-मक़सूद पाने की कहाँ वो आस है

भेद सदियों से सुना है हम सभी ने ख़ास है
जिस बुलंदी से जहाँ दिखता वही कैलास है

वज्ह भी थी और मक़्सद भी बहुत ही था बड़ा
साल चौदह जो बिताए थे वही वनवास है

प्यार झुकता ही नहीं यारों हमें हैं ये पता
'इश्क़ में ही झुक जो जाए फिर वही इख़्लास है

फ़ासले भी सब मकानों में 'मनोहर' क्यूँ रहे
छत फटा है और घर टूटा दिखे इफ़लास है

  - Manohar Shimpi

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