ये अदावतें भी अजीब हैं जो इसी सदी का शजर नहीं

कोई दांव जब चले अब्र सा ही तो बादलों का भी डर नहीं

कहीं वादियों में डगर सही कहीं इत्र सा ही सफ़र सही
जो दिलों में ऐसे बसा सदी से वो कोई और नगर नहीं

वो अदू डरा ही हुआ लगा वो कभी इधर रहे या उधर
कोई तो बिका है वहाँ मगर उसी की कोई भी ख़बर नहीं

वो हरी भरी सी ही वादियाँ उसे ही नज़र कोई है लगी
वो कई दफ़ा हुईं लाल फिर भी उसी पे कोई असर नहीं

ये हसीन हिज्र का है असर ये हसीन इश्क़ की है डगर
तेरे ही सिवा हरी वादियों का सफ़र भी कोई सफ़र नहीं

— Manohar Shimpi

More by Manohar Shimpi

Other ghazal from the same pen

See all from Manohar Shimpi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling