मुझे धुआँ न समझ आसमान ही हूँ मैं
ज़मीन से ही जुड़ा क़द्र-दान ही हूँ मैं
नए सवाल नई राह ज़ुल्मत-ए-शब की
रह-ए-सफ़र पे दिया वो बयान ही हूँ मैं
पढ़े लिखे भी करे हैं सवाल ही कितने
जवाब झूठ न दो इम्तिहान ही हूँ मैं
लड़े भी और हराया भी जब उन्हें हमने
असीम तीर चलाया कमान ही हूँ मैं
रहे खटास पुरानी किसी से भी लेकिन
अना-परस्त नहीं आन-बान ही हूँ मैं
कभी मक़ाम मिला ये पता नहीं मुझको
लड़ा उसी के लिए हाँ गुमान ही हूँ मैं
कभी सवाल किसी के बिखेर देते हैं
जवाब दिल से सुनो बे-ज़ुबान ही हूँ मैं
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