बंदगी में सिर्फ़ दिन वो ही पुराने माँगे
प्यार से फिर महज़ गुज़रे ही ज़माने माँगे
अजनबी ही एक शायर हूँ यहाँ पर फिर भी
ये ज़माना रोज़ मुझ से क्यूँ तराने माँगे
अब दिल-ए-नादाँ तरसते क़ुर्बतों को ही हम
तिश्नगी भी ख़ूब मिलने के बहाने माँगे
अब कहाँ पर वक़्त मिलता है नया लिखने को
है सुख़न-वर ही कई वो भी फ़साने माँगे
हम मनाने के तरीक़े ढूँढते थे यारों
और वो फिर रूठने के ही बहाने माँगे
अब शब-ए-ग़म महज़ कहती है मनोहर हम से
हम मरासिम ही बढ़ाने के ज़माने माँगे
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