bandagi men sirf din vo hi purane maange | बंदगी में सिर्फ़ दिन वो ही पुराने माँगे

  - Manohar Shimpi

बंदगी में सिर्फ़ दिन वो ही पुराने माँगे
प्यार से फिर महज़ गुज़रे ही ज़माने माँगे

अजनबी ही एक शायर हूँ यहाँ पर फिर भी
ये ज़माना रोज़ मुझ से क्यूँ तराने माँगे

अब दिल-ए-नादाँ तरसते क़ुर्बतों को ही हम
तिश्नगी भी ख़ूब मिलने के बहाने माँगे

अब कहाँ पर वक़्त मिलता है नया लिखने को
है सुख़न-वर ही कई वो भी फ़साने माँगे

हम मनाने के तरीक़े ढूँढते थे यारों
और वो फिर रूठने के ही बहाने माँगे

अब शब-ए-ग़म महज़ कहती है मनोहर हम से
हम मरासिम ही बढ़ाने के ज़माने माँगे

  - Manohar Shimpi

Waqt Shayari

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