जो दिल से ज़ेहन के रस्ते पे आता-जाता है
ख़याल-ए-यार नहीं फ़िक्र-ए-आब-ओ-दाना है
मैं अंजुमन को तेरी कहकहों से भर दूँ मगर
लिहाफ़-ए-ख़ामुशी हालात का तक़ाज़ा है
तेरे सिवा भी बहुत हैं हसीं जहाँ में मगर
कहाँ इन आँखों को अब कोई रास आता है
सुख़न में रख के न बेचूँ तो क्या करूँँ इनका
उदासियों का मेरे दिल में कारख़ाना है
तुम्हें भी लगने लगा ख़ुद-परस्त है 'मौजी'
तुम्हें तो यार ख़ुदा की जगह नवाज़ा है
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