लबों के जाम कुछ बेज़ार हैं इस बार होली में

नहीं लौटा है घर मेरा सिपह-सालार होली में

कसक है दर्द है ग़म है मुझे उस की जुदाई का
कि होगा फिर भला कैसे ये दिल गुलज़ार होली में

फफक कर रो पडूँगी रंग मुझ को गर लगाओगे
गुज़ारिश है न छेड़ो मेरे दिल के तार होली में

मेरे साजन गए हैं देश की सीमा सुरक्षा को
सुनाई दे रही उन की प्रबल ललकार होली में

ये सीमाएँ हुईं सौतन निभाती दुश्मनी मुझ से
कभी रहता न साजन पर मेरा अधिकार होली में

वो हर इक बार कहते हैं क़सम खाकर मेरे सर की
ज़रूर आऊँगा मेरी जान अबकी बार होली में

ये पागल दिल धड़कता है अजब सी टीस उठती है
पिया के बिन हुई जाती हूँ मैं लाचार होली में

मगर मैं सोचती हूँ त्याग ही अनुराग है मेरा
यही हितकर वतन के हेतु है हर बार होली में

यही सौग़ात मुझ को 'नित्य' तुम देना मेरे दिलबर
न सीमा से करे दुश्मन कभी व्यभिचार होली में

— Nityanand Vajpayee

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