पर्दा-ए-चश्म हटाओ तो कोई बात बने
नूर-ए-ऐमन में नहाओ तो कोई बात बने
ख़ुद को रंगीन किए फिरते हो रंग-ओ-रस से
श्याम का रंग रचाओ तो कोई बात बने
रोज़ यादों में मेरी आप चले आते हो
मेरी बाहों में समाओ तो कोई बात बने
ख़ैरियत पूछ के चल देते हो साक़ी तुम तो
अपने हाथों से पिलाओ तो कोई बात बने
'नित्य' जन्नत की हक़ीक़त से मैं वाक़िफ़ तो हूँ ख़ूब
फिर भी तुम साथ में आओ तो कोई बात बने
— Nityanand Vajpayee















