जाने क्या बात किस ख़ता का बोझ

बढ़ गया फिर किसी सज़ा का बोझ

मेहरबाँ वो बरस गया हम पर
आख़िरश कम हुआ ख़ुदा का बोझ

ख़ाक रखती है जाने किस किस की
बस हवा ही नहीं हवा का बोझ

यार कोई तो उस को समझाओ
प्यार की नाव पर अना का बोझ

ख़ामुशी से कहीं ज़ियादा है
लौट आई किसी सदा का बोझ

राब्ता ख़त्म कर लिया उस ने
सबके बस का नहीं वफ़ा का बोझ

ज़िंदगी और ज़िंदगी का दर्द
तुम समझते हो क्या क़ज़ा का बोझ

— pankaj pundir

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Gham Shayari

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