सो गया मान कर कहा शब का

जल रहा था चराग़ भी कब का

हम कहानी से हट गए ख़ुद ही
काम आसान कर दिया रब का

कुछ सितारे जला दिए उस ने
और फिर सो गया ख़ुदा शब का

ख़ूब-सूरत है रात, कह दूँ क्या
कह रहा था, ख़याल है सबका

फिर किसी ने पुकार कर मुझ को
काम आख़िर बढ़ा दिया लब का

अब तलक रात जागते हो क्यूँ
काम तो ख़त्म हो गया कब का

— pankaj pundir

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