हुक्म-ए-मुर्शिद पे ही जी उठना है मर जाना है
'इश्क़ जिस सम्त भी ले जाए उधर जाना है
लड़खड़ाता हूँ तो वो रो के लिपट जाता है
मैंने गिरना है तो उस शख़्स ने मर जाना है
उसकी छाँव में भी थक कर नहीं बैठा जाता
तूने जिस पेड़ को फलदार शजर जाना है
ख़ुश्क मश्कीज़ा लिए ख़ाली पलटना है उसे
और दरियाओं का शीराज़ा बिखर जाना है
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