कान साग़र कमर क्या शिखर हो गई
और कहते हैं जूँ तूँ बसर हो गई
साँझ से टाँग पकड़े था परछाई की
फिर कहा चाँद ने चल सहर हो गई
डाल जाते हैं लौंडे कई फिर यहाँ
एक लड़की नहीं डाक-घर हो गई
पहले बर्बाद थोड़ी थी 'रौशन' मियाँ
जब से शाइ'र बने ख़ास कर हो गई
— Raushan miyaa'n















