ग़म की भट्टी में नए ज़ख़्म बनाते जाओ
जितने बन जाएँ उन्हें मुझ पे लगाते जाओ
आप से छीन न ले हँसना मिरी ख़ामोशी
इतने अंदर न मिरे आप यूँ आते जाओ
हम से नाराज़ हुई बैठी है लगता क़ुदरत
गिरती लाशों का अभी बोझ उठाते जाओ
मैं किनारे पे नहीं ठीक से मरने वाला
मुझ को गहराई में ले जा के डुबाते जाओ
ज़िन्दगी मौत के शोलों पे खड़ी है 'सागर'
अच्छा होगा के सभी रिश्ते निभाते जाओ
— Sagar Sahab Badayuni















