हौसला जिसका मर नहीं सकता
मुश्किलों से वो डर नहीं सकता
लोग कहते हैं ज़ख़्म गहरा है
मुद्दतों तक ये भर नहीं सकता
उनकी आदत है यूँँ डराने की
मेरी फ़ितरत है डर नहीं सकता
जब तलक ख़ुद ख़ुदा नहीं चाहे
बद-दुआओं से मर नहीं सकता
लाख फ़ितरत की ज़ुल्फ़ सुलझाओ
बिगड़ा ख़ाका सुधर नहीं सकता
As you were reading Shayari by SALIM RAZA REWA
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