मुश्किलें भरमार होती जा रही हैं आज कल
कोशिशे बेकार होती जा रही हैं आज कल
वो अदा-ए-दिल नशीं क़ातिल नज़र हुस्न ओ हुनर
क़ाबिल-ए-इज़हार होती जा रही हैं आज कल
चाहिए इनको हमेशा इक दवाई की ख़ुराक
ख़्वाहिशें बीमार होती जा रही हैं आज कल
दौलत-ओ-शोहरत की लालच बढ़ गई हैं इस क़दर
ज़िंदगी आज़ार होती जा रही हैं आज कल
ऐ रज़ा कुछ लड़कियाँ जो घर की ज़ीनत थीं कभी
रौनक़-ए-बाज़ार होती जा रही हैं आज कल
As you were reading Shayari by SALIM RAZA REWA
our suggestion based on SALIM RAZA REWA
As you were reading undefined Shayari