ग़मों की गर्द ने ढक ली है हर ख़ुशी मेरी
सिसक-सिसक के गुज़रती है ज़िंदगी मेरी
मैं मुस्कुरा भी दिया टूटकर बिखर भी गया
उसे पता ही नहीं है ये सादगी मेरी
मैं अपने ग़म को छुपा लूँगा इस हुनर के साथ
नज़र न आएगी दुनिया को बेबसी मेरी
बहार आई तो शाख़ों से फूल झड़ने लगे
है मुझको डर मुझे खाए न ताज़गी मेरी
जो अश्क बन के छलकती रही निगाहों से
उसी को लोग समझते रहे ख़ुशी मेरी
ग़मों के शोर से दहला है ऐसा दिल मेरा
डरी-डरी सी रहा करती है ख़ुशी मेरी
रज़ा यही तो मुक़द्दर की मेहरबानी है
हुई न ख़त्म ये तकलीफ़-ए-आशिक़ी मेरी
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