दिलों का हाल जबीं पर लिखा नहीं होता
भला जो दिखता है अक्सर भला नहीं होता
ख़ुदा के होते हुए सरकशी का ये आलम
मैं सोचता हूँ कहीं गर ख़ुदा नहीं होता
कभी कभी तो मेरे साथ यूँँ भी होता है
मैं क्यूँँ ख़फ़ा हूँ मुझे ख़ुद पता नहीं होता
हमारी सोच की हद है ख़लाओं से आगे
प तुम से आगे हमें सोचना नहीं होता
वो देखता है मेरी सम्त बस उसी इक पल
जिस एक पल मैं उसे देखता नहीं होता
कुछ ऐसा रब्त है दोनों के दरमियाँ 'शाकिर'
वो दूर होता है मुझ से जुदा नहीं होता
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