जब जा चुकी है अब तू हूँ ढूँढ़ता मैं तुझ को

कुछ सोचता नहीं, बस हूँ, सोचता मैं तुझ को

था नासमझ मैं थोड़ा, कैसे तुझे बताऊँ
के जान से भी ज़्यादा हूँ मानता मैं तुझ को

मैं जी के मर के देखा सब कुछ मैं कर के देखा
पर इश्क़ था भला कैसे भूलता मैं तुझ को?

तू सुन नहीं रही थी, कुछ कह नहीं रही थी
था चाहता मगर कैसे रोकता मैं तुझ को?

— Shashank Shekhar Pathak

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