अगर हो ग़म-ज़दा तो भी कहाँ नाशाद रहती है
'अलीगढ़' की है वो लेकिन 'अमीनाबाद' रहती है
मोहब्बत में ज़रा हट कर लिया था फ़ैसला उस ने
अधूरी गर मोहब्ब़त हो तभी आबाद रहती है
सितंबर डेट थी सोलह गई थी छोड़कर जब वो
यही तारीख़ है वो जो हमेशा याद रहती है
— Shashank Shekhar Pathak















