गुलों सा खिल गया चेहरा तो आने से
मगर लब सिल गए मेरे तो जाने से
नज़र का रोज़ सदक़ा हम उतारेंगे
कोई मिल जाए ख़ाली हाथ उठाने से
नहीं है यार मेरा फिर भी लगता है
मिला है आज देखो सर झुकाने से
रहेगी जान जब तक जिस्म में यारों
कभी भूलें न हम रस्ते भुलाने से
सुनी है बात उस ने जो नहीं है वो
बढ़ी है बात अब उस के बढ़ाने से
— Usman Saifi















