"मुझे इल्ज़ाम दे सारे"
मुझे इल्ज़ाम दे सारे
सही तू है ग़लत मैं हूँ
करे क्या अब जहाँ में इस
कहीं तू है कहीं मैं हूँ
बिना तेरे सज़ा मेरी
नदी तू मैं किनारा हूँ
नज़ारे क्या हवाएँ क्या
हरा रंग तू जंगल मैं हूँ
चुराए नींद पल भर में
सताए ग़म हँसाए ग़म
दिखाता प्यार दिन सब को
सताए ग़म हँसाए ग़म
सभी के साथ होता है
बहुत नाराज़ होता है
नहीं कुछ भी पता मुझ को
नहीं तेरी यूँ ख़ता कुछ हैं
निभाना है हमें रिश्ता
न खोना तू वफ़ा मैं हूँ
— Vinod Ganeshpure














