"सन्नाटा"
तिरी आँखें नहीं होती
न सन्नाटा कहीं होता
अकेली तू नहीं होती
भटकता मैं नहीं होता
बताएँ क्या जताएँ क्या
सँभाला हैं सताएँ क्या
उतारो तुम नज़र मेरी
ज़बाँ से हम बताएँ क्या
घनी रातें जलाती हैं
तिरी यादें सताती हैं
नहीं रहना मुझे अब तो
नहीं कहना तुझे है कुछ
— Vinod Ganeshpure














