जो मुहब्बत में कभी पकड़ा गया है
वो सलीक़े से बहुत कूटा गया है
वो सलीक़े से बहुत कूटा गया है
दोस्तों से हूँ ख़फ़ा पर ख़ुश भी हूँ मैं
नाम उस के साथ में जोड़ा गया है
मैं दयार-ए-इश्क़ में उलझी पड़ी थी
वो सितमगर तोड़ कर सुलझा गया है
मैसजों में प्यार का पैग़ाम लिखकर
नौकरी की सोच कर काटा गया है
वो जहाँ के वास्ते कुछ भी रही हो
बाप के हाथों से तो कंधा गया है
मैं ख़फ़ा थी और उस ने बाँह खोली
फिर मुहब्बत में मुझे उलझा गया है
वो मकीं कुछ रोज़ से लौटा नहीं है
लग रहा है दिल से वो उकता गया है
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हम ने जिसे इक ज़िन्दगी कह कर गुज़ारी है
उस
उस
में ख़ुशी कुछ भी नहीं बस ख़ाकसारी है
रंज-ओ-अलम के दौर में जैसी उदासी थी
उतनी ख़ुशी के मौसमों में सोगवारी है
अब तक दिल-ए-नाशाद में रहता है दौर-ए-जाम
इस जाम की हर शख़्स से इक बुर्दबारी है
आँगन जहाँ पर अब तलक बस ख़ार होते थे
इक फूल के आने पे कितनी ख़ुशगवारी है
मेरे जहाँ में मर्द अपनी राय देते हैं
मेरे जहाँ में औरतें मर्दों पे भारी है
'अंबर' कोई पूछे कि कैसे इश्क़ होता है
हम को बयाँ करने की कितनी बेक़रारी है
Read Fullरंज-ओ-अलम के दौर में जैसी उदासी थी
उतनी ख़ुशी के मौसमों में सोगवारी है
अब तक दिल-ए-नाशाद में रहता है दौर-ए-जाम
इस जाम की हर शख़्स से इक बुर्दबारी है
आँगन जहाँ पर अब तलक बस ख़ार होते थे
इक फूल के आने पे कितनी ख़ुशगवारी है
मेरे जहाँ में मर्द अपनी राय देते हैं
मेरे जहाँ में औरतें मर्दों पे भारी है
'अंबर' कोई पूछे कि कैसे इश्क़ होता है
हम को बयाँ करने की कितनी बेक़रारी है
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हर रात हम को ख़्वाब से लगने लगे
हम इश्क़ में बेताब से लगने लगे
हम इश्क़ में बेताब से लगने लगे
रंग-ए-रफ़ाक़त का असर कुछ यूँ हुआ
सूखे चमन शादाब से लगने लगे
जो हो सही वो फ़ैसला कर दीजिए
जब साफ़ गो तेज़ाब से लगने लगे
उन का कहा तहरीर कर के रख लिया
जब से हमें कज़्ज़ाब से लगने लगे
वो कौन थे जो ज़ब्त में भी जी गए
शाने हमें सैलाब से लगने लगे
इक तंज़ जिस को भूलना आसान था
उस तंज़ में तेज़ाब से लगने लगे
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Happy Srivastava 'Ambar'
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गर्दिशों में ये सितारे रक़्स करते हैं
नोट पर आदम ये सारे रक़्स करते हैं
नोट पर आदम ये सारे रक़्स करते हैं
सोग में आह-ओ-फ़ुग़ाँ तर्क-ए-वफ़ा और हम
अब तलक सारे नज़ारे रक़्स करते हैं
जल रही हो जब कभी इंसान की बस्ती
रास्तों पर कुछ शरारे रक़्स करते हैं
चाँद सी इक चाँद के बस इक इशारे पर
बज़्म में सारे के सारे रक़्स करते हैं
भूख रोटी की अजब इक धुन बनाती है
मुफ़लिसी में बे-सहारे रक़्स करते हैं
इश्क़ में 'अंबर' हमें बे-ख़ुद सा होना है
जिस तरह दरवेश सारे रक़्स करते हैं
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बैचलर का वो ज़माना जा चुका
कंबलों में फ़ोन आना जा चुका
कंबलों में फ़ोन आना जा चुका
हर दर-ओ-बाम-ए-मकाँ जब याद था
आशिक़ी का वो ज़माना जा चुका
अब कभी दिल्ली नहीं सज पाएगी
इस गली से वो दिवाना जा चुका
हिज्र में अब मर नहीं जाते है हम
क़ैस का था इक ज़माना जा चुका
ऑफ़िसों के रंग में ऐसे ढले
नज़्म गाना गुनगुनाना जा चुका
बज़्म जिन कंधों से देखा था कभी
बाप का जो था वो शाना जा चुका
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उस परी की याद आनी थी हमें
सोग की बातें बतानी थी हमें
सोग की बातें बतानी थी हमें
ख़्वाब ज़ेर-ए-तेग़ रख कर चल दिए
मुफ़लिसी घर की मिटानी थी हमें
मौत से उलझे इसी उम्मीद में
बात उन की आज़मानी थी हमें
उस गली को छोड़ कर हम आ गए
जिस गली से सरगिरानी थी हमें
फूल मिलते थे हमें भी डेट पर
बात कुछ और थी, जवानी थी हमें
साँप पाले आस्तीं में जानकर
दोस्ती में चोट खानी थी हमें
जाम आधा छोड़ कर सुनने लगे
याद तो पूरी कहानी थी हमें
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दुल्हन बन कर वो तैयार हुई है
मेरी ताज़ी ताज़ी हार हुई है
मेरी ताज़ी ताज़ी हार हुई है
अश़्कों अब बह जाओ तुम थोड़ा सा
रस्म-ओ-रुख़सत में दरकार हुई है
अपनों ने जब जब खींची ख़ंजर तो
हर तलवार फ़क़त बेकार हुई है
'जौन' चलो मस्जिद है हम को जाना
मक़्तल है हज़रत पर वार हुई है
दुल्हन के जोड़े में देखा उस को
दर्द मिरी बिल्कुल हमवार हुई है
वो अश्क लिए आँखों में यादों में
अब जा कर ज़ेहनी बीमार हुई है
क्या उम्दा बातें और अदाकारी थी
तू ख़ुद से अच्छी किरदार हुई है
आँखें उन पर से हटती तो कैसे
बरसों बा'द ये आँखें चार हुई है
रोती बोटी रोटी के ख़ातिर, अब
वो नीलाम भरे बाज़ार हुई है
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