जो मुहब्बत में कभी पकड़ा गया है
    वो सलीक़े से बहुत कूटा गया है

    दोस्तों से हूँ ख़फ़ा पर ख़ुश भी हूँ मैं
    नाम उस के साथ में जोड़ा गया है

    मैं दयार-ए-इश्क़ में उलझी पड़ी थी
    वो सितमगर तोड़ कर सुलझा गया है

    मैसजों में प्यार का पैग़ाम लिखकर
    नौकरी की सोच कर काटा गया है

    वो जहाँ के वास्ते कुछ भी रही हो
    बाप के हाथों से तो कंधा गया है

    मैं ख़फ़ा थी और उस ने बाँह खोली
    फिर मुहब्बत में मुझे उलझा गया है

    वो मकीं कुछ रोज़ से लौटा नहीं है
    लग रहा है दिल से वो उकता गया है
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    Happy Srivastava 'Ambar'
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    हम ने जिसे इक ज़िन्दगी कह कर गुज़ारी है
    उस
    में ख़ुशी कुछ भी नहीं बस ख़ाकसारी है

    रंज-ओ-अलम के दौर में जैसी उदासी थी
    उतनी ख़ुशी के मौसमों में सोगवारी है

    अब तक दिल-ए-नाशाद में रहता है दौर-ए-जाम
    इस जाम की हर शख़्स से इक बुर्दबारी है

    आँगन जहाँ पर अब तलक बस ख़ार होते थे
    इक फूल के आने पे कितनी ख़ुशगवारी है

    मेरे जहाँ में मर्द अपनी राय देते हैं
    मेरे जहाँ में औरतें मर्दों पे भारी है

    'अंबर' कोई पूछे कि कैसे इश्क़ होता है
    हम को बयाँ करने की कितनी बेक़रारी है
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    Happy Srivastava 'Ambar'
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    हर रात हम को ख़्वाब से लगने लगे
    हम इश्क़ में बेताब से लगने लगे

    रंग-ए-रफ़ाक़त का असर कुछ यूँ हुआ
    सूखे चमन शादाब से लगने लगे

    जो हो सही वो फ़ैसला कर दीजिए
    जब साफ़ गो तेज़ाब से लगने लगे

    उन का कहा तहरीर कर के रख लिया
    जब से हमें कज़्ज़ाब से लगने लगे

    वो कौन थे जो ज़ब्त में भी जी गए
    शाने हमें सैलाब से लगने लगे

    इक तंज़ जिस को भूलना आसान था
    उस तंज़ में तेज़ाब से लगने लगे
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    Happy Srivastava 'Ambar'
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    दर्द से दिल मुकर न जाए कहीं
    इश्क़ में दिल निखर न जाए कहीं

    तुम अगर यूँ बने रहे दिल में
    हालते दिल सुधर न जाए कहीं

    पी रहा हूँ शराब आँखों से
    आँख में शब गुज़र न जाए कहीं

    नैन तेरे बला के ख़ंजर हैं
    ये जिगर में उतर न जाए कहीं

    रोक दो मौत की ख़बर अंबर
    घर तलक ये ख़बर न जाए कहीं
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    ये मुहब्बत रब का इक इल्हाम है
    अब मगर इस काम में कोहराम है

    प्रेम में गर कृष्ण एक अंजाम है
    इश्क़ का इक नाम भी इस्लाम है

    इंक़लाबी बोल से सीना भरो
    राख़ होना जंग में इकराम है

    गर हुक़ूमत ताज से गूंगे बने
    तो हक़ीक़त बोलती आवाम है

    बाँस बंसी देख कर कहते रहे
    उस मुई के पास तो वो श्याम है

    हम किसी अनपढ़ से ये सुनते रहे
    इश्क़ करना हीं रहीम-ओ-राम है
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    Happy Srivastava 'Ambar'
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    गर्दिशों में ये सितारे रक़्स करते हैं
    नोट पर आदम ये सारे रक़्स करते हैं

    सोग में आह-ओ-फ़ुग़ाँ तर्क-ए-वफ़ा और हम
    अब तलक सारे नज़ारे रक़्स करते हैं

    जल रही हो जब कभी इंसान की बस्ती
    रास्तों पर कुछ शरारे रक़्स करते हैं

    चाँद सी इक चाँद के बस इक इशारे पर
    बज़्म में सारे के सारे रक़्स करते हैं

    भूख रोटी की अजब इक धुन बनाती है
    मुफ़लिसी में बे-सहारे रक़्स करते हैं
    इश्क़ में 'अंबर' हमें बे-ख़ुद सा होना है
    जिस तरह दरवेश सारे रक़्स करते हैं
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    Happy Srivastava 'Ambar'
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    बैचलर का वो ज़माना जा चुका
    कंबलों में फ़ोन आना जा चुका

    हर दर-ओ-बाम-ए-मकाँ जब याद था
    आशिक़ी का वो ज़माना जा चुका

    अब कभी दिल्ली नहीं सज पाएगी
    इस गली से वो दिवाना जा चुका

    हिज्र में अब मर नहीं जाते है हम
    क़ैस का था इक ज़माना जा चुका

    ऑफ़िसों के रंग में ऐसे ढले
    नज़्म गाना गुनगुनाना जा चुका

    बज़्म जिन कंधों से देखा था कभी
    बाप का जो था वो शाना जा चुका
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    Happy Srivastava 'Ambar'
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    देखते हैं उन लबों पर तीर है
    फूल के हाथों में अब शमशीर है

    कर रहे हैं इस तरह से दुख बयाँ
    रात है इक पार्क है तस्वीर है

    मर्द से बाहर निकल जब आओगे
    औरतों में देखना इक मीर है

    इक तरफ़ जो आ रहे हैं राम हैं
    इक तरफ़ जो जल रहा कश्मीर है

    जानवर अब रास्तों पे आ गए
    उठ पड़ी अब धर्म की शमशीर है
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    Happy Srivastava 'Ambar'
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    उस परी की याद आनी थी हमें
    सोग की बातें बतानी थी हमें

    ख़्वाब ज़ेर-ए-तेग़ रख कर चल दिए
    मुफ़लिसी घर की मिटानी थी हमें

    मौत से उलझे इसी उम्मीद में
    बात उन की आज़मानी थी हमें

    उस गली को छोड़ कर हम आ गए
    जिस गली से सरगिरानी थी हमें

    फूल मिलते थे हमें भी डेट पर
    बात कुछ और थी, जवानी थी हमें

    साँप पाले आस्तीं में जानकर
    दोस्ती में चोट खानी थी हमें

    जाम आधा छोड़ कर सुनने लगे
    याद तो पूरी कहानी थी हमें
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    Happy Srivastava 'Ambar'
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    दुल्हन बन कर वो तैयार हुई है
    मेरी ताज़ी ताज़ी हार हुई है

    अश़्कों अब बह जाओ तुम थोड़ा सा
    रस्म-ओ-रुख़सत में दरकार हुई है

    अपनों ने जब जब खींची ख़ंजर तो
    हर तलवार फ़क़त बेकार हुई है

    'जौन' चलो मस्जिद है हम को जाना
    मक़्तल है हज़रत पर वार हुई है

    दुल्हन के जोड़े में देखा उस को
    दर्द मिरी बिल्कुल हमवार हुई है

    वो अश्क लिए आँखों में यादों में
    अब जा कर ज़ेहनी बीमार हुई है

    क्या उम्दा बातें और अदाकारी थी
    तू ख़ुद से अच्छी किरदार हुई है

    आँखें उन पर से हटती तो कैसे
    बरसों बा'द ये आँखें चार हुई है

    रोती बोटी रोटी के ख़ातिर, अब
    वो नीलाम भरे बाज़ार हुई है
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    Happy Srivastava 'Ambar'
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