मिलेगा क्या तुझे सय्याद मुझ को बे-ज़बाँ कर के
सुकून-ए-क़ल्ब मिलता है मुझे आह-ओ-फ़ुग़ाँ कर के
चमन को रौशनी दी नज़्र-ए-आतिश आशियाँ कर के
किया ये तजरबा हम ने घर अपना राएगाँ कर के
हक़ीक़त में करम तुम ने किया है हक़-शनासों पर
हर इक को वाक़िफ़-ए-रस्म-ए-जबीन-ओ-आस्ताँ कर के
उठा पाए न हम लुत्फ़-ए-बहाराँ मौसम-ए-गुल में
कहाँ गुम हो गई परवाज़ क़ैद-ए-आशियाँ कर के
अब ऐसी ज़िंदगी से मौत आ जाती तो बेहतर था
हुई तज़हीक अपनी दास्तान-ए-दिल बयाँ कर के
अगर तफ़्सील से कहता तो वो शायद समझ जाते
मैं अब पछता रहा हूँ इख़्तिसार-ए-दास्ताँ कर के
भटकते रहते यूँही और न पाते उम्र-भर मंज़िल
बड़ा एहसाँ किया तुम ने शरीक-ए-कारवाँ कर के
समझ में आ गई उन की ख़स-ओ-ख़ाशाक की अज़्मत
गई हैं बिजलियाँ आख़िर तवाफ़-ए-आशियाँ कर के
ज़हे मश्क़-ए-तसव्वुर हम उन्हें देखा ही करते हैं
छुपें चाहे जहाँ वो पर्दा-हा-ए-दरमियाँ कर के
समुंदर फिर हिलोरे लेगा तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का
ज़रा देखो तो 'आजिज़' शामिल-ए-उर्दू-ज़बाँ कर के
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मौजूद हैं वो भी बालीं पर अब मौत का टलना मुश्किल है
इक-तरफ़ा कशाकश नज़अ में है दम का भी निकलना मुश्किल है
इक-तरफ़ा कशाकश नज़अ में है दम का भी निकलना मुश्किल है
अनजाने में जो बे-राह चले वो राह पे आ सकता है मगर
बे-राह चले जो दानिस्ता बस उस का सँभलना मुश्किल है
ज़ाहिर न सही दर-पर्दा सही दुश्मन भी हिफ़ाज़त करते हैं
काँटे हों निगहबाँ जिस गुल के उस गुल का मसलना मुश्किल है
हैं इश्क़ की राहें पेचीदा मंज़िल पे पहुँचना सहल नहीं
रस्ते में अगर दिल बैठ गया फिर उस का सँभलना मुश्किल है
आग़ाज़-ए-मोहब्बत में 'आजिज़' रुकती न थी मौज-ए-अश्क-ए-रवाँ
अंजाम अब इन ख़ुश्क आँखों से इक अश्क निकलना मुश्किल है
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हों तुम को मुबारक लाल-ओ-गुहर हम ले के ये दौलत क्या करते
हर शय को फ़ना होना है अगर तो धन से मोहब्बत क्या करते
हर शय को फ़ना होना है अगर तो धन से मोहब्बत क्या करते
सद शुक्र वो थे माइल-ब-करम मरऊब थे रोब-ए-हुस्न से हम
उन से अहवाल-ए-दिल-ए-पुर-ग़म कहने की जसारत क्या करते
हम सहते रहे ज़ुल्म और जफ़ा ये सोच के मुँह से कुछ न कहा
टलता है कहीं क़िस्मत का लिखा फिर उन से शिकायत क्या करते
ज़ाहिर में करम पर माइल हैं आदा की सफ़ों में शामिल हैं
अपने ही हमारे क़ातिल हैं ग़ैरों से शिकायत क्या करते
क्यूँ डर से न होता चेहरा धूल शीशे का हमारा जो था मकाँ
जो संग-ब-कफ़ आए थे यहाँ हम उन से बग़ावत क्या करते
ये काम था बस तुम से मुमकिन मजबूर रहे 'आजिज़' हर छन
तुम ने तो शिकायत की लेकिन हम तुम से शिकायत क्या करते
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हर-सू जहाँ में शाम ओ सहर ढूँडते हैं हम
जो दिल में घर करे वो नज़र ढूँडते हैं हम
जो दिल में घर करे वो नज़र ढूँडते हैं हम
इन बस्तियों को फूँक के ख़ुद अपने हाथ से
अपने नगर में अपना वही घर ढूँडते हैं हम
जुज़ रेग-ज़ार कुछ भी नहीं ता-हद-निगाह
सहरा में साया-दार शजर ढूँडते हैं हम
तस्लीम है कि जुड़ता नहीं है शिकस्ता दिल
फिर भी दुकान-ए-आईना-गर ढूँडते हैं हम
जिस की अदा अदा पे हो इंसानियत को नाज़
मिल जाए काश ऐसा बशर ढूँडते हैं हम
कुछ इम्तियाज़-ए-मज़हब-ओ-मिल्लत नहीं हमें
इक मो'तबर रफ़ीक़-ए-सफ़र ढूँडते हैं हम
इस दौर में जो फ़न को हमारे परख सके
वो साहब-ए-ज़बान-ओ-नज़र ढूँडते हैं हम
हाथ आएगा न कुछ भी ब-जुज़ संग-ए-बे-बिसात
उथले समुंदरों में गुहर ढूँडते हैं हम
'आजिज़' तलाश-ए-शम्अ में परवाने महव हैं
हैरत उन्हें है उन को अगर ढूँडते हैं हम
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किया तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ तुम ने बेहतर
मगर उस का कहीं चर्चा न करना
मुझे तुर्बत में अज़-हद आफ़ियत है
मसीहा अब मुझे ज़िंदा न करना
बढ़ाता है कसल दूरी-ए-मंज़िल
ख़याल-ए-वुसअ'त-ए-सहरा न करना
कठिन हो जाएगी मंज़िल-शनासी
कभी मस्ख़ उन का नक़्श-ए-पा न करना
मोहब्बत में ये है दस्तूर-ए-दुनिया
ज़रा सी बात को इफ़्शा न करना
ये है अब इक तरीक़ा गुफ़्तुगू का
किसी के सामने लब वा न करना
तुम्हारे मुँह पे वो सच बोल देगा
मुक़ाबिल अपने आईना न करना
मुनासिब है कि 'आजिज़' तौबा कर लो
न तज़हीक-ए-मय-ओ-मय-ख़ाना करना
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ये बात सच है मैं बर्ग-ए-ख़िज़ाँ-रसीदा हूँ
मगर सलाम किया करती है बहार मुझे
सितम ये है वो कभी भूल कर नहीं आया
तमाम उम्र रहा जिस का इंतिज़ार मुझे
बस अपने-आप सँवरना भी कोई बात हुई
तू अपनी ज़ुल्फ़ की सूरत कभी सँवार मुझे
अबस है दोस्तो तशरीह-ए-वादा-ए-फ़र्दा
अब इस का ज़िक्र भी होता है नागवार मुझे
तमाम उम्र झुलसता रहा मैं सहरा में
कहीं शजर नज़र आया न साया-दार मुझे
बहार-ए-नौ ये हक़ीक़त है या फ़रेब-ए-निगाह
लिबास-ए-गुल नज़र आता है तार तार मुझे
गुनाह जिस से न सरज़द हुआ हो ऐ 'आजिज़'
उसी को हक़ है वो कह दे गुनाहगार मुझे
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मय-ख़ाने पर काले बादल जब घिर घिर कर आते हैं
हम भी आँखों के पैमाने भर भर कर छलकाते हैं
हम भी आँखों के पैमाने भर भर कर छलकाते हैं
मैं जिन को अपना कहता हूँ कब वो मिरे काम आते हैं
ये सारा संसार है सपना सब झूटे रिश्ते-नाते हैं
तन्हाई के बोझल लम्हे हम इस तरह बिताते हैं
दिल हम को देता है तसल्ली हम दिल को समझाते हैं
जीवन की गुत्थी का सुलझना काम है इक ना-मुम्किन सा
गिर्हें पड़ती ही जाती हैं हम जितना सुलझाते हैं
उन की क़िस्मत में जलना है कौन उन से कहता है जलें
परवाने दीपक पर आ कर अपने-आप जल जाते हैं
जीवन बीता लेकिन अब तक मैं न समझ पाया ये भेद
बीते दिनों की याद आते ही आँसू क्यूँ भर आते हैं
वो जब अपना सर ढकते हैं खुल जाते हैं उन के पैर
जो अपनी चादर से ज़ियादा पैर अपने फैलाते हैं
होता है महसूस ये 'आजिज़' शायद उस ने दस्तक दी
तेज़ हवा के झोंके जब दरवाज़े से टकराते हैं
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यूँ तुझ से दूर दूर रहूँ ये सज़ा न दे
अब और ज़िंदा रहने की मुझ को दुआ न दे
अब और ज़िंदा रहने की मुझ को दुआ न दे
अब एहतियात-ए-शिद्दत-ए-गिर्या न पूछिए
डरता हूँ मैं वो सुन के कहीं मुस्कुरा न दे
लो मैं ने दिल की उस से लगाई तो है मगर
डर है ये शम-ए-ग़म कहीं दामन जला न दे
कहना तो है मुझे भी हदीस-ए-ग़म-ए-हयात
लब खोलने की काश इजाज़त ज़माना दे
हो बिजलियों का मुझ से जहाँ पर मुक़ाबला
या-रब वहीं चमन में मुझे आशियाना दे
उस देने वाले के यहाँ किस शय की है कमी
तुम माँगने की तरह जो माँगो तो क्या न दे
हस्सास मैं बहुत हूँ न लग जाए दिल को ठेस
महफ़िल में मुस्कुरा के मुझे यूँ सदा न दे
मैं आश्ना-ए-दर्द-ओ-ग़म-ए-दिल हूँ चारा-गर
जिस से इफ़ाक़ा हो मुझे ऐसी दवा न दे
'आजिज़' तमाम उम्र मैं खाता रहा फ़रेब
मुझ को मिरी वफ़ाओं का ऐसा सिला न दे
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क्या जाने क्यूँ मुझ से मेरी बरगश्ता तक़दीर हुई
मम्लिकत-ए-ऐश आँख झपकते ही ग़म की जागीर हुई
उस ने मेरे शीशा-ए-दिल को देख के क्यूँ मुँह मोड़ लिया
शायद इस आईने में उस को ज़ाहिर कोई लकीर हुई
जब भी लिक्खा हाल-ए-दिल-ए-मुज़्तर मैं ने उस को रात गए
ता-ब-सहर अश्क-अफ़्शानी से ज़ाएअ'' वो तहरीर हुई
बढ़ती जाती है दूरी-ए-मंज़िल जब से जुनूँ ने छोड़ा साथ
अब तो ख़िरद हर गाम पर अपने पैरों की ज़ंजीर हुई
मुझ को अता करते वो यक़ीनन मेरी तलब से सिवा लेकिन
ख़ुद्दारी में हाथ न फैला शर्म जो दामन-गीर हुई
किस को ख़बर है उन की गली में कितने दिलों का ख़ून हुआ
रा'नाई में उन की गली जब वादी-ए-कश्मीर हुई
उन से करूँ इज़्हार-ए-तमन्ना सोचा रख कर उज़्र-ए-जुनूँ
लेकिन वो भी रास न आया ला-हासिल तदबीर हुई
टप-टप आँख से आँसू टपके 'आजिज़' आह-ए-सर्द के साथ
मेरे सामने नज़्र-ए-आतिश जब मेरी तस्वीर हुई
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क्या जाने किस मक़ाम पे किस शय की हो तलब
चलने से पहले ज़ाद-ए-सफ़र देख लीजिए
हो जाएगा ख़ुद आप को एहसास-ए-बे-रुख़ी
गर आप मेरा ज़ख़्म-ए-जिगर देख लीजिए
सब की तरफ़ है आप की चश्म-ए-नवाज़िशात
काश एक बार आप इधर देख लीजिए
तारे मैं तोड़ लाऊँगा आकाश से मगर
शफ़क़त से आप बाज़ू-ओ-पर देख लीजिए
जम्हूरियत का दर्स अगर चाहते हैं आप
कोई भी सायादार शजर देख लीजिए
हो जाएगी हक़ीक़त-ए-शम्स-ओ-क़मर अयाँ
उन को निगाह भर के अगर देख लीजिए
ये बर्क़-ए-हादिसात भी क्या ज़ुल्म ढाएगी
उठने लगे गुलों से शरर देख लीजिए
'आजिज़' चली हैं ऐसी तअ'स्सुब की आँधियाँ
उजड़े हुए नगर के नगर देख लीजिए
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