Ajiz Matvi

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Ajiz Matvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ajiz Matvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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जब कभी मद्द-ए-मुक़ाबिल वो रुख़-ए-ज़ेबा हुआ आईना भी रह गया हैरत से मुँह तकता हुआ फ़स्ल-ए-गुल में है शिकस्त-ओ-रेख़्त का आईना-दार एक इक तिनका नशेमन का मिरे बिखरा हुआ महव-ए-हैरत हूँ ख़राश-ए-दस्त-ए-ग़म को देख कर ज़ख़्म चेहरे पर हैं या है आईना टूटा हुआ अब्र-ए-ग़म बरसे तो अश्कों की रवानी देखना साहिल-ए-मिज़्गाँ पे है तूफ़ाँ अभी ठहरा हुआ इख़्तिलाफ़-ए-ज़ेहन-ए-फ़ितरत ज़िंदगानी का सराब इश्तिराक-ए-बाहमी ही मौजिब-ए-दरिया हुआ जब मैं उन से कह चुका अपनी हदीस-ए-रंज-ओ-ग़म उन की शोख़ी देखिए कहने लगे पर क्या हुआ मैं समझ पाया न 'आजिज़' ये तिलिस्म-ए-राहबर हर क़दम पर मंज़िल-ए-मक़्सूद का धोका हुआ — Ajiz Matvi
मैं इज़्तिराब में हूँ शाम से सहर के लिए कोई चराग़ अता कर दे रात-भर के लिए ख़ुदा बचाए तुम्हें ऐसी-वैसी नज़रों से गले में डाल लो ता'वीज़ तुम नज़र के लिए क़फ़स-नसीब हैं ना-आश्ना-ए-आज़ादी ये क़ैद एक चुनौती है बाल-ओ-पर के लिए निगाह-ए-बर्क़ में वो ख़ार से खटकने लगे जो तिनके जम्अ'' किए हम ने अपने घर के लिए मसीह-ए-वक़्त तो ऐसी नफ़स सही लेकिन इलाज है कोई ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जिगर के लिए तुम्हारे हुस्न-ओ-अदा के हमीं शिकार नहीं न जाने कितनों के दिल तुम ने बन-सँवर के लिए तमाम-उम्र अँधेरे में कट गई यारब कोई चराग़ अता कर हमारे घर के लिए किसी के सामने सर ख़म करूँँ मैं क्यूँँ 'आजिज़' बनी है मेरी जबीं उन के संग-ए-दर के लिए — Ajiz Matvi
कुछ साज़गार जब मिरे हालात भी नहीं ऐसे में मेरे सर पे तिरा बात भी नहीं मुश्ताक़-ए-दीद भी नहीं ये तरफ़ा बात है दिल में ख़याल-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात भी नहीं कहता नहीं मैं आप को बेगाना-ख़ू मगर पहले सी मुझ पे लुत्फ़-ओ-इनायात भी नहीं मुझ को बनाया मुम्लिकत-ए-ग़म का ताजदार और मेरे लब पे शुक्र के क़लमात भी नहीं किस से करूँँ उम्मीद मैं हाजत-रवाई की जुज़ तेरे कोई क़िबला-ए-हाजात भी नहीं साक़ी ने भी मुझे नज़र-अंदाज़ कर दिया मुझ पर निगाह-ए-मीर-ए-ख़राबात भी नहीं 'आजिज़' हूँ ख़त लिखूँ तो उन्हें किस तरह लिखूँ काग़ज़ नहीं क़लम नहीं दावात भी नहीं — Ajiz Matvi
मौजूद हैं वो भी बालीं पर अब मौत का टलना मुश्किल है इक-तरफ़ा कशाकश नज़अ में है दम का भी निकलना मुश्किल है अनजाने में जो बे-राह चले वो राह पे आ सकता है मगर बे-राह चले जो दानिस्ता बस उस का सँभलना मुश्किल है ज़ाहिर न सही दर-पर्दा सही दुश्मन भी हिफ़ाज़त करते हैं काँटे हों निगहबाँ जिस गुल के उस गुल का मसलना मुश्किल है हैं इश्क़ की राहें पेचीदा मंज़िल पे पहुँचना सहल नहीं रस्ते में अगर दिल बैठ गया फिर उस का सँभलना मुश्किल है आग़ाज़-ए-मोहब्बत में 'आजिज़' रुकती न थी मौज-ए-अश्क-ए-रवाँ अंजाम अब इन ख़ुश्क आँखों से इक अश्क निकलना मुश्किल है — Ajiz Matvi
हर-क़दम मरहला-ए-सब्र-ओ-रज़ा हो जैसे ज़िंदगी मारका-ए-कर्ब-ओ-बला हो जैसे यूँँ गुज़र जाते हैं दुनिया से अदम के राही रह में नक़्श-ए-क़दम-ए-राह-नुमा हो जैसे चुप हुए जाते हैं यूँँ देख के सूरत मेरी हाल मेरा मिरे चेहरे पे लिखा हो जैसे इस तरह काट रहा हूँ मैं शब-ओ-रोज़-ए-हयात हर-नफ़स अपने लिए एक सज़ा हो जैसे दश्त में जलती हैं ता-हद्द-ए-नज़र यूँँ शमएँ सर-ए-हर-ख़ार पे ख़ून-ए-शोहदा हो जैसे रिंद झिझके तो बला-नोशों ने महसूस किया मय नहीं जाम में ख़ून-ए-ग़ुरबा हो जैसे यूँँ शफ़क़-रंग सी है आज गुलिस्ताँ की ज़मीं बरहना-पा कोई काँटों पे चला हो जैसे हर ज़बाँ पर मिरे मिटने के हैं चर्चे लेकिन उन के नज़दीक तो कुछ भी न हुआ हो जैसे आज इस अंदाज़ से आई मुझे हिचकी 'आजिज़' भूलने वाले ने फिर याद किया हो जैसे — Ajiz Matvi
इक बार अपना ज़र्फ़-ए-नज़र देख लीजिए फिर चाहे जिस के ऐब-ओ-हुनर देख लीजिए क्या जाने किस मक़ाम पे किस शय की हो तलब चलने से पहले ज़ाद-ए-सफ़र देख लीजिए हो जाएगा ख़ुद आप को एहसास-ए-बे-रुख़ी गर आप मेरा ज़ख़्म-ए-जिगर देख लीजिए सब की तरफ़ है आप की चश्म-ए-नवाज़िशात काश एक बार आप इधर देख लीजिए तारे मैं तोड़ लाऊँगा आकाश से मगर शफ़क़त से आप बाज़ू-ओ-पर देख लीजिए जम्हूरियत का दर्स अगर चाहते हैं आप कोई भी सायादार शजर देख लीजिए हो जाएगी हक़ीक़त-ए-शम्स-ओ-क़मर अयाँ उन को निगाह भर के अगर देख लीजिए ये बर्क़-ए-हादिसात भी क्या ज़ुल्म ढाएगी उठने लगे गुलों से शरर देख लीजिए 'आजिज़' चली हैं ऐसी तअ'स्सुब की आँधियाँ उजड़े हुए नगर के नगर देख लीजिए — Ajiz Matvi
जहाँ न दिल को सुकून है न है क़रार मुझे ये किस मक़ाम पे ले आई याद-ए-यार मुझे ये बात सच है मैं बर्ग-ए-ख़िज़ाँ-रसीदा हूँ मगर सलाम किया करती है बहार मुझे सितम ये है वो कभी भूल कर नहीं आया तमाम उम्र रहा जिस का इंतिज़ार मुझे बस अपने-आप सँवरना भी कोई बात हुई तू अपनी ज़ुल्फ़ की सूरत कभी सँवार मुझे अबस है दोस्तो तशरीह-ए-वादा-ए-फ़र्दा अब इस का ज़िक्र भी होता है नागवार मुझे तमाम उम्र झुलसता रहा मैं सहरा में कहीं शजर नज़र आया न साया-दार मुझे बहार-ए-नौ ये हक़ीक़त है या फ़रेब-ए-निगाह लिबास-ए-गुल नज़र आता है तार तार मुझे गुनाह जिस से न सरज़द हुआ हो ऐ 'आजिज़' उसी को हक़ है वो कह दे गुनाहगार मुझे — Ajiz Matvi
मय-ख़ाने पर काले बादल जब घिर घिर कर आते हैं हम भी आँखों के पैमाने भर भर कर छलकाते हैं मैं जिन को अपना कहता हूँ कब वो मिरे काम आते हैं ये सारा संसार है सपना सब झूटे रिश्ते-नाते हैं तन्हाई के बोझल लम्हे हम इस तरह बिताते हैं दिल हम को देता है तसल्ली हम दिल को समझाते हैं जीवन की गुत्थी का सुलझना काम है इक ना-मुम्किन सा गिर्हें पड़ती ही जाती हैं हम जितना सुलझाते हैं उन की क़िस्मत में जलना है कौन उन से कहता है जलें परवाने दीपक पर आ कर अपने-आप जल जाते हैं जीवन बीता लेकिन अब तक मैं न समझ पाया ये भेद बीते दिनों की याद आते ही आँसू क्यूँँ भर आते हैं वो जब अपना सर ढकते हैं खुल जाते हैं उन के पैर जो अपनी चादर से ज़ियादा पैर अपने फैलाते हैं होता है महसूस ये 'आजिज़' शायद उस ने दस्तक दी तेज़ हवा के झोंके जब दरवाज़े से टकराते हैं — Ajiz Matvi
यूँँ तुझ से दूर दूर रहूँ ये सज़ा न दे अब और ज़िंदा रहने की मुझ को दुआ न दे अब एहतियात-ए-शिद्दत-ए-गिर्या न पूछिए डरता हूँ मैं वो सुन के कहीं मुस्कुरा न दे लो मैं ने दिल की उस से लगाई तो है मगर डर है ये शम-ए-ग़म कहीं दामन जला न दे कहना तो है मुझे भी हदीस-ए-ग़म-ए-हयात लब खोलने की काश इजाज़त ज़माना दे हो बिजलियों का मुझ से जहाँ पर मुक़ाबला या-रब वहीं चमन में मुझे आशियाना दे उस देने वाले के यहाँ किस शय की है कमी तुम माँगने की तरह जो माँगो तो क्या न दे हस्सास मैं बहुत हूँ न लग जाए दिल को ठेस महफ़िल में मुस्कुरा के मुझे यूँँ सदा न दे मैं आश्ना-ए-दर्द-ओ-ग़म-ए-दिल हूँ चारा-गर जिस से इफ़ाक़ा हो मुझे ऐसी दवा न दे 'आजिज़' तमाम उम्र मैं खाता रहा फ़रेब मुझ को मिरी वफ़ाओं का ऐसा सिला न दे — Ajiz Matvi
जाम तो जाम मय-ए-होश-रुबा भी बदली साथ ही रिंदों के पीने की अदा भी बदली फ़स्ल-ए-गुल बदली सबा बदली फ़ज़ा भी बदली आप बदले तो गुलिस्ताँ की हवा भी बदली टूट जाएगा यक़ीनन दिल-ए-मय-ख्वार अगर निगह-ए-साक़ी-ए-मय-ख़ाना ज़रा भी बदली बज़्म-ए-याराँ में सदा से मुझे पहचानता कौन मेरे हालात जो बदले तो सदा भी बदली आज तक उस ने तो वा'दा कोई ईफ़ा न किया जाने क्या सोच के फिर शर्त-ए-वफ़ा भी बदली होने लगता है कुछ एहसास शिकस्त-ए-तौबा बादा-ख़ाने पे अगर छाई ज़रा भी बदली वक़्त के साथ बदल जाती है हर शय 'आजिज़' आप तो बदले मगर ख़ू-ए-जफ़ा भी बदली — Ajiz Matvi
कभी अहल-ए-मोहब्बत यूँँ न ख़ौफ़-ए-जिस्म-ओ-जाँ करते अगर शैख़-ओ-बरहमन जश्न-ए-नाक़ूस-ओ-अज़ाँ करते नवाज़िश काश मुझ पर इतनी मेरे मेहरबाँ करते कभी दिल की तसल्ली के लिए भूले से हाँ करते हमारे जज़्बा-ए-तामीर से होते अगर वाक़िफ़ तो सदियों बर्क़ के शो'ले तवाफ़-ए-आशियाँ करते फ़सुर्दा यूँँ न होते ग़ुंचा-ओ-गुल मौसम-ए-गुल में अगर दिल से चमन की आबियारी बाग़बाँ करते नवेद-ए-फ़स्ल-ए-गुल आते हैं दिल अपना तड़प उट्ठा असीर-ए-ग़म हैं वर्ना हम भी सैर-ए-गुलिस्ताँ करते फ़ज़ा-ए-साहिल-ए-उम्मीद अगर कुछ रास आ जाती तो हम क्यूँँ नज़्र-ए-तूफ़ाँ कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ करते हमें भी मिल गई होती सनद मंज़िल-शनासी की सलीक़े से अगर तक़लीद मीर-ए-कारवाँ करते कभी बाद-ए-सबा बन कर कभी जारूब-कश हो कर तमन्ना थी मुसलसल हम तवाफ़-ए-आस्ताँ करते था चुप रहना ही बेहतर उन की बज़्म-ए-नाज़ में 'आजिज़' कोई ग़म-आश्ना होता तो शरह-ए-दास्ताँ करते — Ajiz Matvi
बहारों से ख़िज़ाँ तक यूँँही सैर-ए-गुलिस्ताँ कर के रफ़ू करते रहे हम जेब-ओ-दामाँ धज्जियाँ कर के मिलेगा क्या तुझे सय्याद मुझ को बे-ज़बाँ कर के सुकून-ए-क़ल्ब मिलता है मुझे आह-ओ-फ़ुग़ाँ कर के चमन को रौशनी दी नज़्र-ए-आतिश आशियाँ कर के किया ये तजरबा हम ने घर अपना राएगाँ कर के हक़ीक़त में करम तुम ने किया है हक़-शनासों पर हर इक को वाक़िफ़-ए-रस्म-ए-जबीन-ओ-आस्ताँ कर के उठा पाए न हम लुत्फ़-ए-बहाराँ मौसम-ए-गुल में कहाँ गुम हो गई परवाज़ क़ैद-ए-आशियाँ कर के अब ऐसी ज़िंदगी से मौत आ जाती तो बेहतर था हुई तज़हीक अपनी दास्तान-ए-दिल बयाँ कर के अगर तफ़्सील से कहता तो वो शायद समझ जाते मैं अब पछता रहा हूँ इख़्तिसार-ए-दास्ताँ कर के भटकते रहते यूँँही और न पाते उम्र-भर मंज़िल बड़ा एहसाँ किया तुम ने शरीक-ए-कारवाँ कर के समझ में आ गई उन की ख़स-ओ-ख़ाशाक की अज़्मत गई हैं बिजलियाँ आख़िर तवाफ़-ए-आशियाँ कर के ज़हे मश्क़-ए-तसव्वुर हम उन्हें देखा ही करते हैं छुपें चाहे जहाँ वो पर्दा-हा-ए-दरमियाँ कर के समुंदर फिर हिलोरे लेगा तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का ज़रा देखो तो 'आजिज़' शामिल-ए-उर्दू-ज़बाँ कर के — Ajiz Matvi
हंगामा क्यूँँ बपा है ज़रा बाम पर से देख शो'ले बुलंद होते हैं ये किस के घर से देख बिखरें न ये ज़मीं पे कहीं चश्म-ए-तर से देख पलकों तक आ गए हैं जो चल कर जिगर से देख ऐ दोस्त पैरवी-ए-कलीमाना है अबस जल्वों को उस के तू निगहा-ए-मो'तबर से देख यूँँ सर उठा के देख न तू जानिब-ए-फ़लक ये ताज-ए-तमकनत न गिरे तेरे सर से देख इस तरह है ग़मों को मिरे दिल से रस्म-ओ-राह जिस तरह रब्त रखते हैं साए शजर के देख अपनी नज़र से देख तही-दस्ती-ए-सदफ़ दरिया का ज़र्फ़ क्या है ये चश्म-ए-गुहरस देख इंसान हादसात से कितना क़रीब है तू भी ज़रा निकल के कभी अपने घर से देख 'आजिज़' ये क़ौल अपने बुज़ुर्गों का याद रख रस्ता कभी न छोड़ना दुश्मन के डर से देख — Ajiz Matvi
हों तुम को मुबारक लाल-ओ-गुहर हम ले के ये दौलत क्या करते हर शय को फ़ना होना है अगर तो धन से मोहब्बत क्या करते सद शुक्र वो थे माइल-ब-करम मरऊब थे रोब-ए-हुस्न से हम उन से अहवाल-ए-दिल-ए-पुर-ग़म कहने की जसारत क्या करते हम सहते रहे ज़ुल्म और जफ़ा ये सोच के मुँह से कुछ न कहा टलता है कहीं क़िस्मत का लिखा फिर उन से शिकायत क्या करते ज़ाहिर में करम पर माइल हैं आदा की सफ़ों में शामिल हैं अपने ही हमारे क़ातिल हैं ग़ैरों से शिकायत क्या करते क्यूँँ डर से न होता चेहरा धूल शीशे का हमारा जो था मकाँ जो संग-ब-कफ़ आए थे यहाँ हम उन से बग़ावत क्या करते ये काम था बस तुम से मुमकिन मजबूर रहे 'आजिज़' हर छन तुम ने तो शिकायत की लेकिन हम तुम से शिकायत क्या करते — Ajiz Matvi
हर-सू जहाँ में शाम ओ सहर ढूँडते हैं हम जो दिल में घर करे वो नज़र ढूँडते हैं हम इन बस्तियों को फूँक के ख़ुद अपने हाथ से अपने नगर में अपना वही घर ढूँडते हैं हम जुज़ रेग-ज़ार कुछ भी नहीं ता-हद-निगाह सहरा में साया-दार शजर ढूँडते हैं हम तस्लीम है कि जुड़ता नहीं है शिकस्ता दिल फिर भी दुकान-ए-आईना-गर ढूँडते हैं हम जिस की अदा अदा पे हो इंसानियत को नाज़ मिल जाए काश ऐसा बशर ढूँडते हैं हम कुछ इम्तियाज़-ए-मज़हब-ओ-मिल्लत नहीं हमें इक मो'तबर रफ़ीक़-ए-सफ़र ढूँडते हैं हम इस दौर में जो फ़न को हमारे परख सके वो साहब-ए-ज़बान-ओ-नज़र ढूँडते हैं हम हाथ आएगा न कुछ भी ब-जुज़ संग-ए-बे-बिसात उथले समुंदरों में गुहर ढूँडते हैं हम 'आजिज़' तलाश-ए-शम्अ में परवाने महव हैं हैरत उन्हें है उन को अगर ढूँडते हैं हम — Ajiz Matvi
क़लम हो जाए सर पर्वा न करना अमीर-ए-शहर को सज्दा न करना किया तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ तुम ने बेहतर मगर उस का कहीं चर्चा न करना मुझे तुर्बत में अज़-हद आफ़ियत है मसीहा अब मुझे ज़िंदा न करना बढ़ाता है कसल दूरी-ए-मंज़िल ख़याल-ए-वुसअ'त-ए-सहरा न करना कठिन हो जाएगी मंज़िल-शनासी कभी मस्ख़ उन का नक़्श-ए-पा न करना मोहब्बत में ये है दस्तूर-ए-दुनिया ज़रा सी बात को इफ़्शा न करना ये है अब इक तरीक़ा गुफ़्तुगू का किसी के सामने लब वा न करना तुम्हारे मुँह पे वो सच बोल देगा मुक़ाबिल अपने आईना न करना मुनासिब है कि 'आजिज़' तौबा कर लो न तज़हीक-ए-मय-ओ-मय-ख़ाना करना — Ajiz Matvi
हसरतें आ आ के जम्अ' हो रही हैं दिल के पास कारवाँ गोया पहुँचने वाला है मंज़िल के पास बीच में जब तक थीं मौजें उन में शोरिश थी बहुत इंतिशार उन में हुआ जब आ गईं साहिल के पास नज़्र-ए-क़ातिल जान जब कर दी तो बाक़ी क्या रहा अब तड़पने के अलावा है ही क्या बिस्मिल के पास ग़र्क़ कर दें मेरी कश्ती फिर ये मौजें देखना हश्र तक पटका करेंगी अपना सर साहिल के पास भीक देना तो कुजा कासा भी उस ने ले लिया मैं अब इक हसरत-ज़दा हूँ क्या है मुझ साइल के पास एक हम हैं हम ने कश्ती डाल दी गिर्दाब में एक तुम हो डरते हो आते हुए साहिल के पास ख़ैर हो 'आजिज़' कहीं ऐसा न हो दिल डूब जाए इश्क़ के दरिया में हलचल हो रही है दिल के पास — Ajiz Matvi
क्यूँँ कहूँ कोई क़द-आवर नहीं आया अब तक हाँ मिरे क़द के बराबर नहीं आया अब तक एक मुद्दत से हूँ मैं सीना-सिपर मैदाँ में हमला-आवर कोई बढ़ कर नहीं आया अब तक ये तो दरिया हैं जो आपे से गुज़र जाते हैं जोश में वर्ना समुंदर नहीं आया अब तक होंगे मंज़िल से हम-आग़ोश ये उम्मीद बंधी रास्ते में कोई पत्थर नहीं आया अब तक क्या ज़माने में कोई गोश-बर-आवाज़ नहीं कोई भी दिल की सदा पर नहीं आया अब तक जाने क्या बात है साक़ी कि तिरी महफ़िल में जो गया बढ़ वो पलट कर नहीं आया अब तक इंतिहा ये है कि पथरा गईं आँखें अपनी सामने वो परी-पैकर नहीं आया अब तक क्या करिश्मा है दुर-ए-अश्क-ए-मोहब्बत अपना सदफ़दुर-ए-चश्म से बाहर नहीं आया अब तक मुंतज़िर हूँ मैं कफ़न बाँध के सर से 'आजिज़' सामने से कोई ख़ंजर नहीं आया अब तक — Ajiz Matvi
दर्द-ए-मुसलसल से आहों में पैदा वो तासीर हुई अक्सर चारागरों की हालत मुझ से सिवा गम्भीर हुई क्या जाने क्यूँँ मुझ से मेरी बरगश्ता तक़दीर हुई मम्लिकत-ए-ऐश आँख झपकते ही ग़म की जागीर हुई उस ने मेरे शीशा-ए-दिल को देख के क्यूँँ मुँह मोड़ लिया शायद इस आईने में उस को ज़ाहिर कोई लकीर हुई जब भी लिक्खा हाल-ए-दिल-ए-मुज़्तर मैं ने उस को रात गए ता-ब-सहर अश्क-अफ़्शानी से ज़ाएअ'' वो तहरीर हुई बढ़ती जाती है दूरी-ए-मंज़िल जब से जुनूँ ने छोड़ा साथ अब तो ख़िरद हर गाम पर अपने पैरों की ज़ंजीर हुई मुझ को अता करते वो यक़ीनन मेरी तलब से सिवा लेकिन ख़ुद्दारी में हाथ न फैला शर्म जो दामन-गीर हुई किस को ख़बर है उन की गली में कितने दिलों का ख़ून हुआ रा'नाई में उन की गली जब वादी-ए-कश्मीर हुई उन से करूँँ इज़्हार-ए-तमन्ना सोचा रख कर उज़्र-ए-जुनूँ लेकिन वो भी रास न आया ला-हासिल तदबीर हुई टप-टप आँख से आँसू टपके 'आजिज़' आह-ए-सर्द के साथ मेरे सामने नज़्र-ए-आतिश जब मेरी तस्वीर हुई — Ajiz Matvi