kabhi ahl-e-mohabbat yuñ na khauf-e-jism-o-jaan karte | कभी अहल-ए-मोहब्बत यूँँ न ख़ौफ़-ए-जिस्म-ओ-जाँ करते

  - Ajiz Matvi
कभीअहल-ए-मोहब्बतयूँँख़ौफ़-ए-जिस्म-ओ-जाँकरते
अगरशैख़-ओ-बरहमनजश्न-ए-नाक़ूस-ओ-अज़ाँकरते
नवाज़िशकाशमुझपरइतनीमेरेमेहरबाँकरते
कभीदिलकीतसल्लीकेलिएभूलेसेहाँकरते
हमारेजज़्बा-ए-तामीरसेहोतेअगरवाक़िफ़
तोसदियोंबर्क़केशो'लेतवाफ़-ए-आशियाँकरते
फ़सुर्दायूँँहोतेग़ुंचा-ओ-गुलमौसम-ए-गुलमें
अगरदिलसेचमनकीआबियारीबाग़बाँकरते
नवेद-ए-फ़स्ल-ए-गुलआतेहैंदिलअपनातड़पउट्ठा
असीर-ए-ग़महैंवर्नाहमभीसैर-ए-गुलिस्ताँकरते
फ़ज़ा-ए-साहिल-ए-उम्मीदअगरकुछरासजाती
तोहमक्यूँँनज़्र-ए-तूफ़ाँकश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँकरते
हमेंभीमिलगईहोतीसनदमंज़िल-शनासीकी
सलीक़ेसेअगरतक़लीदमीर-ए-कारवाँकरते
कभीबाद-ए-सबाबनकरकभीजारूब-कशहोकर
तमन्नाथीमुसलसलहमतवाफ़-ए-आस्ताँकरते
थाचुपरहनाहीबेहतरउनकीबज़्म-ए-नाज़में'आजिज़'
कोईग़म-आश्नाहोतातोशरह-ए-दास्ताँकरते
  - Ajiz Matvi
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Khamoshi Shayari

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