"तेरा हिज़्र"
सोचता हूँ कि तेरी याद को जहन से रिहा करुँ
तुम ही बताओ तुम्हें भुलाने के सिवा, क्या करुँ
अगर मेरे वस्ल का भी तुम पर कोई असर नहीं
फिर इस से तो बेहतर है कि, मैं तुम्हें जुदा करुँ
मैं कईं गजलें लिखूँ तेरे दिए हुए उनवानो पर
शर्मो हया की बात, उनमे तेरा जिक्र ही ना करुँ
एक तेरा साया जुदा करने में मुझे क्या ही हर्ज़
तेरा साया ही मेरे साथ चले, तो फिर क्या करुँ
एक ही ज़िंदगी मिली वो भी तुम पर गुजार दूँ
तुम्हें ही अजीज नहीं, तुम्हें कैसे हमसाया करुँ
वो एक पेड़ कटा है किसी का चुल्हा जलाने को
तुम मुझे क्यों जाया करो, मैं तुम्हें क्यों जाया करुँ
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