कुछ साज़गार जब मिरे हालात भी नहीं

ऐसे में मेरे सर पे तिरा बात भी नहीं

मुश्ताक़-ए-दीद भी नहीं ये तरफ़ा बात है
दिल में ख़याल-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात भी नहीं

कहता नहीं मैं आप को बेगाना-ख़ू मगर
पहले सी मुझ पे लुत्फ़-ओ-इनायात भी नहीं

मुझ को बनाया मुम्लिकत-ए-ग़म का ताजदार
और मेरे लब पे शुक्र के क़लमात भी नहीं

किस से करूँ उम्मीद मैं हाजत-रवाई की
जुज़ तेरे कोई क़िबला-ए-हाजात भी नहीं

साक़ी ने भी मुझे नज़र-अंदाज़ कर दिया
मुझ पर निगाह-ए-मीर-ए-ख़राबात भी नहीं

'आजिज़' हूँ ख़त लिखूँ तो उन्हें किस तरह लिखूँ
काग़ज़ नहीं क़लम नहीं दावात भी नहीं

— Ajiz Matvi

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