बे-फ़र्श-ओ-बाम सिलसिला-ए-काएनात के
    इस बे-सुतूँ निज़ाम में तू भी है मैं भी हूँ

    बे-साल-ओ-सिन ज़मानों में फैले हुए हैं हम
    बे-रंग-ओ-नस्ल नाम में तू भी है मैं भी हूँ
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    Akbar Hyderabadi
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    कहकशाँ के तनाज़ुर में हम क्या हमारा सितारा है क्या
    अन-गिनत आफ़्ताबों की अक़्लीम में इक शरारा है क्या

    कौन समझे ज़बाँ बर्ग-ओ-अश्जार की दश्त-ओ-कोहसार की
    कौन जाने कि इस बे-कराँ ख़ामुशी में इशारा है क्या

    हम मोहब्बत को इक मंसब-ए-आशिक़ाना समझते रहे
    ये न सोचा मोहब्बत की सौदागरी में ख़सारा है क्या

    ये तिलिस्म-ए-तमाशा है सारा जहाँ इक तिलिस्म-ए-नज़र
    रौशनी का समुंदर हैं आँखें मगर आश्कारा है क्या

    वो है बे-मिस्ल उस को उसी के हवाले से समझा करो
    उस के इदराक में दख़्ल-ए-तश्बीह क्या इस्तिआ'रा है क्या

    एक मिट्टी के घर में जिए उम्र भर और मिट्टी हुए
    कुल जहाँ यूँ तो 'अकबर' हमारे लिए पर हमारा है क्या
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    Akbar Hyderabadi
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    शाख़-ए-बुलंद-ए-बाम से इक दिन उतर के देख
    अम्बार-ए-बर्ग-ओ-बार-ए-ख़िज़ाँ में बिखर के देख

    मिट्टी के सादगी में अलग सा जमाल है
    रंगों की निकहतों की क़बा तार करके देख

    इम्काँ की वुसअ'तों के उफ़ुक़ ज़ार खुल गए
    पर तोलने लगे हैं परिंदे सहर के देख

    ज़ुल्मत की कश्तियों को भँवर है ये रौशनी
    दर खुल रहे हैं दानिश-ओ-इल्म-ओ-ख़बर के देख

    क्या जाने ग़म की आँच का परतव कहाँ पड़े
    अंगड़ाई ले रहे हैं हयूले शरर के देख

    संगीन हादसों की हिकायत तवील है
    कोह-ए-गिराँ की बात न कर ज़ख़्म सर के देख

    अपनी बसारतों को जसारत की आँच दे
    मंज़र इसी नज़र से जहान-ए-दिगर के देख

    पिंदार-ए-सर-निगूँ का जुनूँ मो'तबर नहीं
    बुझते हुए चराग़ की लौ तेज़ करके देख

    'अकबर' निदा-ए-शब को नवा-ए-सहर समझ
    लौ दे रहे हैं हौसले अहल-ए-नज़र के देख
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    Akbar Hyderabadi
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    हाँ यही शहर मिरे ख़्वाबों का गहवारा था
    इन्ही गलियों में कहीं मेरा सनम-ख़ाना था

    इसी धरती पे थे आबाद समन-ज़ार मिरे
    इसी बस्ती में मिरी रूह का सरमाया था

    थी यही आब-ओ-हवा नश्व-ओ-नुमा की ज़ामिन
    इसी मिट्टी से मिरे फ़न का ख़मीर उट्ठा था

    अब न दीवारों से निस्बत है न बाम-ओ-दर से
    क्या इसी घर से कभी मेरा कोई रिश्ता था

    ज़ख़्म यादों के सुलगते हैं मिरी आँखों में
    ख़्वाब इन आँखों ने क्या जानिए क्या देखा था

    मेहरबाँ रात के साए थे मुनव्वर ऐसे
    अश्क आँखों में लिए दिल ये सरासीमा था

    अजनबी लगते थे सब कूचा ओ बाज़ार 'अकबर'
    ग़ौर से देखा तो वो शहर मिरा अपना था
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    Akbar Hyderabadi
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    निगह-ए-शौक़ से हुस्न-ए-गुल-ओ-गुलज़ार तो देख
    आँखें खुल जाएँगी ये मंज़र-ए-दिलदार तो देख

    पैकर-ए-शाहिद-ए-हस्ती में है इक आँच नई
    लज़्ज़त-ए-दीद उठा शोला-ए-रुख़्सार तो देख

    शोख़ी-ए-नक़्श कोई हादसा-ए-वक़्त नहीं
    मोजज़ा-कारी-ए-ख़ून-ए-दिल-ए-फ़नकार तो देख

    हर दुकाँ अपनी जगह हैरत-ए-नज़्ज़ारा है
    फ़िक्र-ए-इंसाँ के सजाए हुए बाज़ार तो देख

    बन गए गर्द-ए-सफ़र क़ाफ़िले आवाज़ों के
    आदम-ए-नौ की ज़रा गर्मी-ए-रफ़्तार तो देख

    मुंक़लिब हो गया पैमाना-ए-हर-पस्त-ओ-बुलंद
    देख कर अपनी तरफ़ जानिब-ए-कोहसार तो देख

    नए आहंग से अब नग़्मा-सरा है 'अकबर'
    फ़िक्र के साथ ज़रा शोख़ी-ए-गुफ़्तार तो देख
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    Akbar Hyderabadi
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    ज़िंदान-ए-सुब्ह-ओ-शाम में तू भी है मैं भी हूँ
    इक गर्दिश-ए-मुदाम में तू भी है मैं भी हूँ

    बे-फ़र्श-ओ-बाम सिलसिला-ए-काएनात के
    इस बे-सुतूँ निज़ाम में तू भी है मैं भी हूँ

    बे-साल-ओ-सिन ज़मानों में फैले हुए हैं हम
    बे-रंग-ओ-नस्ल नाम में तू भी है मैं भी हूँ

    इस दाइमी हिसार में हम को मफ़र कहाँ
    ज़र्रों के अज़दहाम में तू भी है मैं भी हूँ

    हर तीरा-फ़ाम सुब्ह का विर्सा है मुश्तरक
    हर नूर-दीदा शाम में तू भी है मैं भी हूँ
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    Akbar Hyderabadi
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    ये कौन मेरी तिश्नगी बढ़ा बढ़ा के चल दिया
    कि लौ चिराग़-ए-दर्द की बढ़ा बढ़ा के चल दिया

    ये मेरा दिल ही जानता है कितना संग-दिल है वो
    कि मुझ से अपनी दोस्ती बढ़ा बढ़ा के चल दिया

    बिछड़ के उस से ज़िंदगी वबाल-ए-जान हो गई
    वो दिल में शौक़-ए-ख़ुद-कुशी बढ़ा बढ़ा के चल दिया

    करूँ तो अब मैं किस से अपनी वुसअत-ए-नज़र की बात
    वो मुझ में हिस्स-ए-आगही बढ़ा बढ़ा के चल दिया

    न दीद की उमीद अब न लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-विसाल
    कि लय वो साज़-ए-हिज्र की बढ़ा बढ़ा के चल दिया

    वो आया 'अकबर' इस अदा से आज मेरे सामने
    कि इक झलक सी ख़्वाब की दिखा दिखा के चल दिया
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    Akbar Hyderabadi
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    बस इक तसलसुल-ए-तकरार-ए-क़ुर्ब-ओ-दूरी था
    विसाल ओ हिज्र का हर मरहला उबूरी था

    मिरी शिकस्त भी थी मेरी ज़ात से मंसूब
    कि मेरी फ़िक्र का हर फ़ैसला शुऊरी था

    थी जीती जागती दुनिया मिरी मोहब्बत की
    न ख़्वाब का सा वो आलम कि ला-शुऊरी था

    तअ'ल्लुक़ात में ऐसा भी एक मोड़ आया
    कि क़ुर्बतों पे भी दिल को गुमान-ए-दूरी था

    रिवायतों से किनारा-कशी भी लाज़िम थी
    और एहतिराम-ए-रिवायात भी ज़रूरी था

    मशीनी दौर के आज़ार से हुआ साबित
    कि आदमी का मलाल आदमी से दूरी था

    खुला है कब कोई जौहर हिजाब में 'अकबर'
    गुहर के बाब में तर्क-ए-सदफ़ ज़रूरी था
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    Akbar Hyderabadi
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    सायों से भी डर जाते हैं कैसे कैसे लोग
    जीते-जी ही मर जाते हैं कैसे कैसे लोग

    छोड़ के माल-ओ-दौलत सारी दुनिया में अपनी
    ख़ाली हाथ गुज़र जाते हैं कैसे कैसे लोग

    बुझे दिलों को रौशन करने सच को ज़िंदा रखने
    जान से अपनी गुज़र जाते हैं कैसे कैसे लोग

    अक़्ल-ओ-ख़िरद के बल बूते पर सब को हैराँ कर के
    काम अनोखे कर जाते हैं कैसे कैसे लोग

    हो बे-लौस मोहब्बत जिन की ग़नी हों जिन के दिल
    दामन सब के भर जाते हैं ऐसे ऐसे लोग
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    Akbar Hyderabadi
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    अता हुई किसे सनद नज़र नज़र की बात है
    हुआ है कौन नाम-ज़द नज़र नज़र की बात है

    गुल ओ सितारा ओ क़मर सभी हसीन हैं मगर
    है कौन इन में मुस्तनद नज़र नज़र की बात है

    इज़ाफ़ी ए'तिबार है तअय्युन-ए-मक़ाम भी
    है पस्त भी बुलंद-क़द नज़र नज़र की बात है

    बुरे भले में फ़र्क़ है ये जानते हैं सब मगर
    है कौन नेक कौन बद नज़र नज़र की बात है

    ज़मीं अगरचे बिस्तर-ए-गुल-ओ-समन भी है मगर
    किसी को है यही लहद नज़र नज़र की बात है

    कोई चले तमाम उम्र कोई सिर्फ़ दो क़दम
    कहाँ है मंज़िलों की हद नज़र नज़र की बात है
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    Akbar Hyderabadi
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