Altaf Mashhadi

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Altaf Mashhadi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Altaf Mashhadi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

फिर दयार-ए-हिन्द को आबाद करने के लिए झूम कर उट्ठो वतन आज़ाद करने के लिए — Altaf Mashhadi

Ghazal

आ चल के बसें हम-दम-ए-दैरीना कहीं और मैं ढूँढ़ निकालूँगा फ़लक और ज़मीं और बचती हुई नज़रों से टपकते हैं फ़साने ईजाद तकल्लुम की हुई तर्ज़-ए-हसीं और गुल्हा-ए-तबस्सुम पे नज़र डालने वाले इन होंठों में पिन्हाँ हैं कई ख़ुल्द-ए-बरीं और ज़ौ-बार-ओ-दरख़्शाँ है ये अनवार-ए-ख़ुदी से सज्दों की सियाही को है मतलूब जबीं और इक अश्क में तब्दील हुआ अपना सरापा कुछ माँग ले उल्फ़त से मिरी जान-ए-हज़ीं और ज़ुल्फ़ों को ज़रा और भी आँखों पे झुका दो मयख़ाने से बादल को करो कुछ तो क़रीं और 'अलताफ़' मुझे जिस ने दिया दर्द-ए-मोहब्बत उस आँख में क्या ऐसी कोई चीज़ नहीं और — Altaf Mashhadi
हो गई इश्क़ में बदनाम जवानी अपनी बन गई मरकज़-ए-आलाम जवानी अपनी माज़ी-ओ-हाल हैं महरूम-ए-शराब-ओ-नग़्मा हाए अफ़्सुर्दा-ओ-नाकाम जवानी अपनी आह वो सुब्ह जो थी सुब्ह-ए-बहार-ए-हस्ती है उसी सुब्ह की अब शाम जवानी अपनी एक तारीक फ़ज़ा एक घटा सा माहौल किसी मुफ़्लिस का है अंजाम जवानी अपनी उन्हीं राहों में उन्हीं मस्त-ओ-जवाँ गलियों में लड़खड़ाई है बहर-गाम जवानी अपनी एक वो दिन था कि मय-ख़ानों पे हम भारी थे आज है दौर-ए-तह-ए-जाम जवानी अपनी इक्तिफ़ा कर के खनकते हुए रोज़-ओ-शब पर बन गई ज़ीस्त पर इल्ज़ाम जवानी अपनी दिन हुआ धूप चढ़ी ढल गए साए 'अलताफ़' अब है इक बुझती हुई शाम जवानी अपनी — Altaf Mashhadi
लेटा हुआ हूँ साया-ए-ग़ुर्बत में घर से दूर दिल से क़रीं हैं अहल-ए-वतन और नज़र से दूर जब तक है दिल रहीन-ए-मआल-ओ-असीर-ए-अक़्ल रहना है तुझ से और तिरी रहगुज़र से दूर ऐ कैफ़ उन की मस्त निगाहों में छुप के आ ऐ दर्द-ए-दम ज़दन में हो मेरे जिगर से दूर इक दिन उलटने वाली है ज़ाहिद बिसात-ए-ज़ोहद कब तक रहेगा दिल निगह-ए-फ़ित्ना-गर से दूर वो कोई ज़िंदगी है जवानी है वो कोई ऐ दोस्त जो है तेरे जमाल-ए-नज़र से दूर क्या आई तेरे जी में कि तक़दीर यूँँ मुझे फेंका है ला के वादी-ए-ग़ुर्बत में घर से दूर ऐ हुस्न-ए-बे-पनाह बताए कोई मुझे दुनिया की कौन चीज़ है तेरे असर से दूर अल्लाह रे नसीब कि पाई है वो फ़ुग़ाँ जो उम्र भर रही है फ़रेब-ए-असर से दूर 'अलताफ़' नाज़ अपनी गदाई पे है मुझे दामन है उस का साया-ए-लाल-ओ-गुहरस दूर — Altaf Mashhadi
ख़िज़ाँ से मानूस हो चुके हैं नहीं ख़बर कुछ बहार क्या है तड़प की लज़्ज़त है जिन को हासिल नज़र में उन की क़रार क्या है बचेगा कब तक ग़रीब इंसाँ हवादिस-ए-गर्दिश-ए-ज़माँ से हवा के झोंकों में जल सकेगा चराग़ ये ए'तिबार क्या है क़रीब हो कर भी दूर हैं जैसे एक दरिया के दो किनारे यूँँही गुलिस्ताँ में रह के भी हम नहीं हैं वाक़िफ़ बहार क्या है चमन के हो कर जो जी रहे हैं ख़िज़ाँ है रश्क-ए-बहार उन की परस्तिश-ए-गुल्सिताँ ही ठहरी तो फ़र्क़-ए-ग़ुंचा-ओ-ख़ार क्या है नशात-ए-वस्ल-ओ-शराब-ए-दीदार पर जो कम-ज़र्फ़ मुतमइन हैं उन्हें कोई किस तरह बताए तअ'य्युश-ए-इंतिज़ार क्या है ख़ुदा-रा 'अलताफ़' मुझ से अहबाब मेरी तन्हाइयाँ न छीनें ग़मों के होते हुए किसी को ज़रूरत-ए-ग़म-गुसार क्या है — Altaf Mashhadi
ख़ुश-रंग-ओ-सहर-कार नज़ारों को क्या हुआ अल्लाह इस चमन की बहारों को क्या हुआ रौशन थीं जिन से बज़्म-ए-तसव्वुर की ख़ल्वतें इन रश्क-ए-मेहर-ओ-माह सितारों को क्या हुआ साहिल को पा सकी न कभी कश्ती-ए-हयात दरिया-ए-आरज़ू के किनारों को क्या हुआ अपने पराए हो गए क़िस्मत के साथ साथ मजबूर ज़िंदगी के सहारों को क्या हुआ नग़्मा ब-लब हूँ और न नाला ब-लब हूँ मैं साज़-ए-जुनून-ओ-इश्क़ के तारों को क्या हुआ लब-हा-ए-लाला-गूँ हैं और इक तल्ख़ी-ए-इताब मीठे तबस्सुमों की फुवारों को क्या हुआ मुद्दत से गुलिस्ताँ है ब-रंग-ए-रुख़-ए-मरीज़ 'अलताफ़' सुर्ख़ सुर्ख़ बहारों को क्या हुआ — Altaf Mashhadi
निगाह-ए-मस्त में क्या रंग-ए-वालिहाना था सुरूर-ओ-कैफ़ में डूबा हुआ ज़माना था किसी की उठती जवानी का जब ज़माना था मिरी निगाह का हर फ़े'ल शाइ'राना था सितम-नसीब की अल्लाह रे सोख़्ता बख़्ती है बिजलियों का नशेमन जो आशियाना था अज़ल से क़ैद-ए-अनासिर अता हुई मुझ को मिरे नसीब में ज़िंदाँ का आब-ओ-दाना था वुफ़ूर-ए-दर्द से जब हिचकियाँ सी आने लगीं हर एक ज़ख़्म के लब पर मिरा फ़साना था शुरू-ए-इश्क़ में क्या मेरी शाइ'री थी न पूछ फ़लक पे मुर्ग़-ए-तख़य्युल का आशियाना था वतन में हज़रत-ए-'अलताफ़' ज़िंदगी अपनी बहार ख़ुल्द-ए-मोहब्बत का इक फ़साना था — Altaf Mashhadi