Deepti Mishra

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@deepti-mishra

Deepti Mishra shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Deepti Mishra's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है — Deepti Mishra

Ghazal

अजब कश्मकश है अजब है कशाकश ये क्या बीच में है हमारे तुम्हारे ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत की ख़ातिर मरासिम हैं सारे हैं चारों तरफ़ ही बहुत लोग लेकिन हक़ीक़त में कोई भी अपना नहीं है दिखावा दिखावा सभी कुछ दिखावा दिखावे में जीते हैं सारे के सारे बुलंदी पे जिन को भी देखा ये पाया सभी आसरा ढूँडते फिर रहे हैं किसे सरपरस्ती के क़ाबिल समझिए जिए जा रहे हैं ख़ुद अपने सहारे सभी अपनी अपनी कहे जा रहे हैं हमें हम से छीने लिए जा रहे हैं हमें अपनी ख़ातिर भी रहने दो थोड़ा नहीं कोई अपना सिवा अब हमारे हमें अपनी ज़द में ही रहना पड़ेगा ख़ुदी को ख़ुदी में डुबोना पड़ेगा न आपे से बाहर तू आना समुंदर समुंदर को समझा रहे हैं किनारे फ़क़त दूरियों में ही सारी कशिश है कि नज़दीकियों से भरम टूटते हैं फ़लक पे चमकना है क़िस्मत हमारी ज़मीं से ये कहते हैं टूटे सितारे ये झूटे से रिश्ते ये फ़र्ज़ी से नाते कहाँ तक निभाएँ कहाँ तक निभाएँ बहुत हो चुका बस बहुत हो चुका अब कोई तो बढ़े ये मखोटे उतारे — Deepti Mishra
दोनों में कितना फ़र्क़ मगर दोनों का हासिल तन्हाई अपनों में दूरी लाती है वो शोहरत हो या रुस्वाई जीवन के कोरे काग़ज़ पर जीना होगा तहरीरों में उजले पन्नों पर स्याही से करनी होगी हर्फ़-आराई हम हैं उस का ही अक्स मगर है बीच में जीवन का दर्पन जब टूटेगा जीवन-दर्पन तब ज़ाहिर होगी सच्चाई पहले तो ख़ुद से दूर किया फिर सज़ा सुनाई जीने की जी चुके तो ये फ़रमान मिला अब फिर से होगी सुनवाई वो ख़ुद में मुकम्मल है तो फिर क्यूँँकर वो ख़ुद में रह न सका क्यूँँ बिखर गया ज़र्रा ज़र्रा क्यूँँ सह न सका वो तन्हाई — Deepti Mishra
बे-हद बेचैनी है लेकिन मक़्सद ज़ाहिर कुछ भी नहीं पाना खोना हँसना रोना क्या है आख़िर कुछ भी नहीं अपनी अपनी क़िस्मत सब की अपना अपना हिस्सा है जिस्म की ख़ातिर लाखों सामाँ रूह की ख़ातिर कुछ भी नहीं उस की बाज़ी उस के मोहरे उस की चालें उस की जीत उस के आगे सारे क़ादिर माहिर शातिर कुछ भी नहीं उस का होना या ना होना ख़ुद में उजागर होता है गर वो है तो भीतर ही है वर्ना ब-ज़ाहिर कुछ भी नहीं दुनिया से जो पाया उस ने दुनिया ही को सौंप दिया ग़ज़लें नज़्में दुनिया की हैं क्या है शाइ'र कुछ भी नहीं — Deepti Mishra

Nazm

बात है तो कुछ ऐब सी लेकिन फिर भी है हो गई थी मोहब्बत एक मर्द को एक सुनहरी मछली से लहरों से अटखेलियाँ करती बल खाती चमचमाती मछली भा गई थी मर्द को टुकटुकी बाँधे पहरों देखता रहता वो उस शोख़ की अठखेलियाँ मछली को भी अच्छा लगता था मर्द का इस तरह से निहारना बंध गए दोनों प्यार के बंधन में मिलन की ख़्वाहिश फ़ितरी थी मर्द ने मछली से इल्तिजा की एक बार सिर्फ़ एक बार पानी से बाहर आने की कोशिश करो मोहब्बत का जुनून इतना शदीद था कि बग़ैर कुछ सोचे-समझे मछली पानी से बाहर आ गई छट-पटा गई बहुत बरी तरह से छट-पटा गई लेकिन अब वो अपने महबूब की बाँहों में थी मोहब्बत की कैफ़ियत में कुछ पल को सारी तड़प सारी छट-पटाहट जाती रही दो बदन इक जान हो गए सैराब हो कर महबूब ने महबूबा को पानी के सुपुर्द कर दिया बड़ा अनोखा बड़ा मसर्रत-अंगेज़ और बड़ा दर्दनाक था ये मेल हर बार पूरी ताक़त बटोर कर चल पड़ती महबूबा महबूब से मिलने तड़फड़ाती छट-पटाती प्यार देती प्यार पाती सैराब करती सैराब होती और फिर लौट आती पानी में एक दिन मछली को जाने क्या सूझी उस ने मर्द से कहा आज तुम आओ मैं पानी में कैसे आऊँ कुछ पल अपने साँसें रोक लो मछली ने कहा साँस रोक लूँ या'नी जीना रोक लूँ कुछ पल जीने के लिए ही तो आता हूँ मैं तुम्हारे पास साँस रोक लूँगा तो जि यूँँगा कैसे मर्द ने कहा मछली सकते में थी एक ही पल में: मर्द की फ़ितरत और मोहब्बत के बाहमी रिश्ते की सच्चाई उस के सामने थी अब कुछ जानने पाने और चाहने को बाक़ी नहीं बचा था मछली ने बे-कैफ़ निगाहों से मर्द को देखा और डूब गई बे-पनाह गहराइयों में उधर ख़ुद से बे-ख़बर मर्द जीने की ख़्वाहिश लिए अभी तक वहीं बैठा है और सोच रहा है मेरा क़ुसूर क्या है — Deepti Mishra
रद्दी अख़बार की तरह मुझे बेच दिया गया एक कबाड़ी के हाथों तराज़ुओं में तोल कर उस ने मेरी क़ीमत आँक दी ख़ूब-सूरत जिल्द जिस पर मेरा उनवान लिखा था उस ने नोच फेंकी वज़्न बढ़ाने वाला गत्ते का टुकड़ा उसे क़ुबूल नहीं था मैं बे-नाम हो गई मेरे औराक़ फड़फड़ा उठे कसमसा उठे तब एक भारी बाट धर दिया गया मुझ पर और मैं नई ताज़ा हवा से महरूम हो गई रद्दी के गट्ठर के साथ वो कबाड़ी मुझे अपने घर ले गया वहाँ मेरा एक एक वरक़ फाड़ा गया लिफ़ाफ़े बनाए गए हल्दी धनिया और मिर्च रखने के लिए माहिर उँगलियाँ लिफ़ाफ़े बना रही थीं मेरे सफ़्हों पर लिखी इबारतें टूट-फूट कर सामने आ रही थीं क्या ग़ज़ब है नहीं इंसान को इंसान की क़द्र हर फ़रिश्ते को ये हसरत है कि इंसाँ होता लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँँ आख़िरी वरक़ को एक बच्चे ने उठा लिया खेल खेल में हवाई जहाज़ बना कर आसमान में उड़ा दिया इस पर लिखा था मैं कहाँ रुकता हूँ अर्श-ओ-फ़र्श की आवाज़ से मुझ को जाना है बहुत ऊँचा हद-ए-पर्वाज़ से — Deepti Mishra