मैं हर मौसम में उन से पूछता हूँ
किधर जाऊँ किधर जाने के दिन हैं
नया-पन सर्द होता रहा है
पुरानी आग सुलगाने के दिन हैं
बशर की ज़िंदगी के चार दिन भी
कहाँ जीने के मर जाने के दिन हैं
नहीं हमवार राह-ए-ज़िंदगानी
कभी खोने कभी पाने के दिन हैं
जवानी भी कहाँ है अह्द-ए-इशरत
जवानी में भी ग़म खाने के दिन हैं
'कँवल' इस घर में तो मकतब न खोलो
जहाँ बच्चों के मुस्काने के दिन हैं
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सब को देता है वो शराब अपनी
है जो गर्दिश में जाम उस का है
महव-ए-हैरत हैं देखने वाले
इतना ऊँचा मक़ाम उस का है
है वही हर्फ़ हर्फ़ ताबिंदा
जिस के अंदर पयाम उस का है
वो है ग़ाएब मगर अज़ल ही से
हर क़दम पर निज़ाम उस का है
रहगुज़र उस के क़ाफ़िले उस के
रख़्श भी तेज़ गाम उस का है
हम तो सब आरज़ी मुसाफ़िर हैं
जावेदानी क़ियाम उस का है
कार-गाहों में दस्त-ओ-पा उस के
उन से वाबस्ता काम उस का है
काएनात उस की बे-कराँ है 'कँवल'
जिस में सब एहतिमाम उस का है
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अना की क़ैद से आज़ाद हो कर क्यूँ नहीं आता
जो बाहर है वो मेरे दिल के अंदर क्यूँ नहीं आता
जो बाहर है वो मेरे दिल के अंदर क्यूँ नहीं आता
उड़ान उस की अगर मेरे ही जैसी है फ़ज़ाओं में
तो क़द उस का मिरे क़द के बराबर क्यूँ नहीं आता
मैं पहले शीशा-ए-दिल को किसी खिड़की में रख आऊँ
फिर उस के बा'द सोचूँगा कि पत्थर क्यूँ नहीं आता
छुपा लेती है दुनिया किस तरह ये ज़हर बरसों तक
धुआँ जो दिल के अंदर है वो बाहर क्यूँ नहीं आता
कोई तक़्सीम का माहिर अगर मिल जाए तो पूछूँ
कि हर क़तरे के हिस्से में समुंदर क्यूँ नहीं आता
हज़ारों आश्ना होते हैं लेकिन आड़े वक़्तों में
ज़रूरत जिस की होती है मुयस्सर क्यूँ नहीं आता
'कँवल' फ़नकार के बारे में ये भी इक मुअ'म्मा है
जो अब तक आ चुका है उस से बेहतर क्यूँ नहीं आता
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दरीचा हो कि दर उलझा हुआ है
मिरा तो घर का घर उलझा हुआ है
मिरा तो घर का घर उलझा हुआ है
बदन के पेच-ओ-ख़म तो झेल लेते
क़यामत है कि सर उलझा हुआ
बड़ी सीधी है चाहत मंज़िलों की
मगर ज़ौक़-ए-सफ़र उलझा हुआ है
न जाने क्या हुआ है आदमी को
जिधर देखो उधर उलझा हुआ है
'कँवल' कटता है मेरा वक़्त जिस में
वो दफ़्तर बेशतर उलझा हुआ है
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वो सितमगर जिधर गया होगा
इक ज़माना उधर गया होगा
इक ज़माना उधर गया होगा
आने वाला ज़मीं पे आता था
जाने वाला किधर गया होगा
गाहे-गाहे तो ख़ुद समुंदर भी
अपनी लहरों से डर गया होगा
चारा-गर बे-सबब नहीं रोता
कोई बीमार मर गया होगा
जिस पे ग़म की नज़र पड़ी होगी
उस का चेहरा निखर गया होगा
दिल जो बिगड़ा हुआ था मुद्दत से
चोट खा कर सँवर गया होगा
मेरा दुश्मन 'कँवल' पस-ए-पर्दा
जो भी करना था कर गया होगा
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दिखा के अपनी हसीं आन-बान पल भर में
वो दूर कर गया मेरी थकान पल भर में
वो दूर कर गया मेरी थकान पल भर में
बग़ैर आग लगाए भी कुछ हसीनों ने
जला दिए हैं कई जिस्म-ओ-जान पल भर में
तमाम लोग इसी डर में मर रहे हैं यहाँ
बिछड़ न जाएँ ज़मीं आसमान पल भर में
नमाज़-ए-इश्क़ भी पढ़ता वो काश रुक जाता
जो दे गया मिरे दिल में अज़ान पल भर में
वो बे-ज़बान था लेकिन ये वाक़िआ'' है 'कँवल'
सुना गया है कोई दास्तान पल भर में
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क्यूँ तिरे अपने ग़म-गुसारों से
ज़ख़्म-ख़ुर्दा है ज़िंदगानी लिख
ख़ूबियाँ लिख शराब की लेकिन
रूह-अफ़्ज़ा है सिर्फ़ पानी लिख
देख कर बहर-ओ-बर के हंगा
में
कोई दिलचस्प सी कहानी लिख
दिल के सहरा में गर्म अश्कों से
कैसे होती है बाग़बानी लिख
हर्फ़-ए-अव्वल से लिख के नाम-ए-ख़ुदा
दिल की तख़्ती पे हर्फ़-ए-सानी लिख
वस्ल की शाम के वरक़ पे 'कँवल'
शादमानी ही शादमानी लिख
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उसी अंदाज़ से गिरती है बिजली आशियाने पर
हवा गुस्ताख़ है बरसात का मंज़र नहीं बदला
अगर बदला है कुछ कुछ जिस्म-ओ-जाँ का रूप बाहरस
वही है रूह मेरी ज़ात का मंज़र नहीं बदला
हज़ारों लोग अब भी हाथ फैलाए हैं सड़कों पर
हमारे शहर में ख़ैरात का मंज़र नहीं बदला
'कँवल' इक मेहरबाँ ने दी थी जो मुझ को मोहब्बत में
ख़ुदा का शुक्र उस सौग़ात का मंज़र नहीं बदला
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अजनबी रहगुज़र के थे ही नहीं
हम जिधर थे उधर के थे ही नहीं
हम जिधर थे उधर के थे ही नहीं
छोड़ कर अपना घर कहाँ जाते
हम किसी और घर के थे ही नहीं
कैसे आते वो हम-सफ़र वापस
जो हमारे सफ़र के थे ही नहीं
जो न आए हमारे दामन में
फल हमारे शजर के थे ही नहीं
वो नज़ारे जो हम से दूर रहे
वो हमारी नज़र के थे ही नहीं
साथ चलते किसी के हम कब तक
हम पराई डगर के थे ही नहीं
चल दिए छोड़ कर जो यार 'कँवल'
वो हमारे नगर के थे ही नहीं
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