ana ki qaid se azaad ho kar kyuuñ nahin aata | अना की क़ैद से आज़ाद हो कर क्यूँ नहीं आता

  - G R Kanwal

अना की क़ैद से आज़ाद हो कर क्यूँ नहीं आता
जो बाहर है वो मेरे दिल के अंदर क्यूँ नहीं आता

उड़ान उस की अगर मेरे ही जैसी है फ़ज़ाओं में
तो क़द उस का मिरे क़द के बराबर क्यूँ नहीं आता

मैं पहले शीशा-ए-दिल को किसी खिड़की में रख आऊँ
फिर उस के बाद सोचूँगा कि पत्थर क्यूँ नहीं आता

छुपा लेती है दुनिया किस तरह ये ज़हर बरसों तक
धुआँ जो दिल के अंदर है वो बाहर क्यूँ नहीं आता

कोई तक़्सीम का माहिर अगर मिल जाए तो पूछूँ
कि हर क़तरे के हिस्से में समुंदर क्यूँ नहीं आता

हज़ारों आश्ना होते हैं लेकिन आड़े वक़्तों में
ज़रूरत जिस की होती है मुयस्सर क्यूँ नहीं आता

'कँवल' फ़नकार के बारे में ये भी इक मुअ'म्मा है
जो अब तक आ चुका है उस से बेहतर क्यूँ नहीं आता

  - G R Kanwal

Samundar Shayari

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