jis ki buniyaad ho jawaani par | जिस की बुनियाद हो जवानी पर

  - G R Kanwal

जिस की बुनियाद हो जवानी पर
देर लगती है उस कहानी पर

आज फिर डूबने का ख़दशा है
आज दरिया है फिर रवानी पर

जाने क्या सोच कर हवाओं ने
लिख दिया नाम मेरा पानी पर

अक्स अपना उसे भी अच्छा लगा
ख़ुश हुआ मैं भी नक़्श-ए-सानी पर

जी भी था उस के साथ चलने का
शक भी था उस की पासबानी पर

कोई सुलतान हो सका न 'कँवल'
हुक्मराँ दिल की राजधानी पर

  - G R Kanwal

Shama Shayari

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