जिस की बुनियाद हो जवानी पर
देर लगती है उस कहानी पर
आज फिर डूबने का ख़दशा है
आज दरिया है फिर रवानी पर
जाने क्या सोच कर हवाओं ने
लिख दिया नाम मेरा पानी पर
अक्स अपना उसे भी अच्छा लगा
ख़ुश हुआ मैं भी नक़्श-ए-सानी पर
जी भी था उस के साथ चलने का
शक भी था उस की पासबानी पर
कोई सुलतान हो सका न 'कँवल'
हुक्मराँ दिल की राजधानी पर
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