shab vahii lekin nazaara aur hai | शब वही लेकिन नज़ारा और है

  - G R Kanwal

शब वही लेकिन नज़ारा और है
रौशनी कम है सितारा और है

कश्तियाँ तो एक जैसी हैं तमाम
हैं अलग दरिया किनारा और है

इस तरफ़ लहरों का मंज़र है अलग
उस तरफ़ पानी का धारा और है

मुश्तरक हैं मंज़िलें लेकिन सफ़र
है जुदा उन का हमारा और है

पहले कहते थे सनम को माहताब
अहद-ए-नौ का इस्तिआरा और है

रूह के दम से है उस की काएनात
जिस्म को किस का सहारा और है

बन रहा है अब जो धरती पे 'कँवल'
वो जहाँ सारे का सारा और है

  - G R Kanwal

Dariya Shayari

Our suggestion based on your choice

More by G R Kanwal

As you were reading Shayari by G R Kanwal

Similar Writers

our suggestion based on G R Kanwal

Similar Moods

As you were reading Dariya Shayari Shayari