शब वही लेकिन नज़ारा और है
रौशनी कम है सितारा और है
कश्तियाँ तो एक जैसी हैं तमाम
हैं अलग दरिया किनारा और है
इस तरफ़ लहरों का मंज़र है अलग
उस तरफ़ पानी का धारा और है
मुश्तरक हैं मंज़िलें लेकिन सफ़र
है जुदा उन का हमारा और है
पहले कहते थे सनम को माहताब
अहद-ए-नौ का इस्तिआरा और है
रूह के दम से है उस की काएनात
जिस्म को किस का सहारा और है
बन रहा है अब जो धरती पे 'कँवल'
वो जहाँ सारे का सारा और है
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