फ़क़ीराना सदा ख़ामोश क्यूँ है
क़लंदर की नवा ख़ामोश क्यूँ है
जिसे मक़्सूद था बस गुनगुनाना
वही बाद-ए-सबा ख़ामोश क्यूँ है
सदाक़त कुछ बता अब महफ़िलों में
तिरा नग़्मा-सरा ख़ामोश क्यूँ है
फ़ना जब हर तरफ़ मंडला रही है
तो ऐसे में बक़ा ख़ामोश क्यूँ है
है मौसम लब-कुशाई का चमन में
शजर गुम-सुम हवा ख़ामोश क्यूँ है
दिए जब और सारे जल रहे हैं
मोहब्बत का दिया ख़ामोश क्यूँ है
'कँवल' जिस शहर में सब बोलते हैं
वहाँ इब्न-ए-ख़ुदा ख़ामोश क्यूँ है
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