घर नहीं रहगुज़र में रहता है
पाँव मेरा सफ़र में रहता है
वो चला जाए तो भी पहरों तक
उस का चेहरा नज़र में रहता है
जा चुका है जो बज़्म-ए-हस्ती से
वो भी दीवार-ओ-दर में रहता है
चारा-गर का करम तो है फिर भी
दर्द ही दर्द सर में रहता है
जिस ने तश्कील की है मेरी 'कँवल'
मेरे क़ल्ब-ओ-जिगर में रहता है
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