jahaan main hooñ vahaañ haalaat ka manzar nahin badla | जहाँ मैं हूँ वहाँ हालात का मंज़र नहीं बदला

  - G R Kanwal

जहाँ मैं हूँ वहाँ हालात का मंज़र नहीं बदला
वही हैं चाँद तारे रात का मंज़र नहीं बदला

उसी अंदाज़ से गिरती है बिजली आशियाने पर
हवा गुस्ताख़ है बरसात का मंज़र नहीं बदला

अगर बदला है कुछ कुछ जिस्म-ओ-जाँ का रूप बाहरस
वही है रूह मेरी ज़ात का मंज़र नहीं बदला

हज़ारों लोग अब भी हाथ फैलाए हैं सड़कों पर
हमारे शहर में ख़ैरात का मंज़र नहीं बदला

'कँवल' इक मेहरबाँ ने दी थी जो मुझ को मोहब्बत में
ख़ुदा का शुक्र उस सौग़ात का मंज़र नहीं बदला

  - G R Kanwal

Dushman Shayari

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