मता-ए-होश लुट जाने के दिन हैं
दिल-ए-नादाँ को समझाने के दिन हैं
मैं हर मौसम में उन से पूछता हूँ
किधर जाऊँ किधर जाने के दिन हैं
नया-पन सर्द होता रहा है
पुरानी आग सुलगाने के दिन हैं
बशर की ज़िंदगी के चार दिन भी
कहाँ जीने के मर जाने के दिन हैं
नहीं हमवार राह-ए-ज़िंदगानी
कभी खोने कभी पाने के दिन हैं
जवानी भी कहाँ है अह्द-ए-इशरत
जवानी में भी ग़म खाने के दिन हैं
'कँवल' इस घर में तो मकतब न खोलो
जहाँ बच्चों के मुस्काने के दिन हैं
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