ho navishta ye bhi jaise kaatib-e-taqdeer ka | हो नविश्ता ये भी जैसे कातिब-ए-तक़दीर का

  - G R Kanwal

हो नविश्ता ये भी जैसे कातिब-ए-तक़दीर का
काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का

हल्क़ा-ए-अह्ल-ए-ज़बाँ में ख़ुश हूँ मैं ये देख कर
मुनफ़रिद लहजा है मेरे दोस्त की तक़रीर का

ता-अबद समझे न जिस को इब्न-ए-आदम का दिमाग़
जुज़ कोई ऐसा न हो या-रब तिरी तहरीर का

है तसव्वुर पास जिस के सैर-ए-आलम के लिए
क्या असर हो उस के पाँव पर किसी ज़ंजीर का

दूसरों की पगड़ियाँ भी चाहता है छीन लूँ
आदमी भूका है कितना अपनी ही तौक़ीर का

नाम तक आया नहीं जिन में कहीं फ़रहाद का
तज़्किरा है उन किताबों में भी जू-ए-शीर का

मैं ने तन की रौशनी को कम ही पूजा है 'कँवल'
मैं रहा शैदा हमेशा रूह की तनवीर का

  - G R Kanwal

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