बहर-ओ-बर में कलाम उस का है
ज़िक्र उस का है नाम उस का है
सब को देता है वो शराब अपनी
है जो गर्दिश में जाम उस का है
महव-ए-हैरत हैं देखने वाले
इतना ऊँचा मक़ाम उस का है
है वही हर्फ़ हर्फ़ ताबिंदा
जिस के अंदर पयाम उस का है
वो है ग़ाएब मगर अज़ल ही से
हर क़दम पर निज़ाम उस का है
रहगुज़र उस के क़ाफ़िले उस के
रख़्श भी तेज़ गाम उस का है
हम तो सब आरज़ी मुसाफ़िर हैं
जावेदानी क़ियाम उस का है
कार-गाहों में दस्त-ओ-पा उस के
उन से वाबस्ता काम उस का है
काएनात उस की बे-कराँ है 'कँवल'
जिस में सब एहतिमाम उस का है
— G R Kanwal















