ajnabi raahguzaar ke the hi nahin | अजनबी रहगुज़र के थे ही नहीं

  - G R Kanwal

अजनबी रहगुज़र के थे ही नहीं
हम जिधर थे उधर के थे ही नहीं

छोड़ कर अपना घर कहाँ जाते
हम किसी और घर के थे ही नहीं

कैसे आते वो हम-सफ़र वापस
जो हमारे सफ़र के थे ही नहीं

जो न आए हमारे दामन में
फल हमारे शजर के थे ही नहीं

वो नज़ारे जो हम से दूर रहे
वो हमारी नज़र के थे ही नहीं

साथ चलते किसी के हम कब तक
हम पराई डगर के थे ही नहीं

चल दिए छोड़ कर जो यार 'कँवल'
वो हमारे नगर के थे ही नहीं

  - G R Kanwal

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