अजनबी रहगुज़र के थे ही नहीं
हम जिधर थे उधर के थे ही नहीं
छोड़ कर अपना घर कहाँ जाते
हम किसी और घर के थे ही नहीं
कैसे आते वो हम-सफ़र वापस
जो हमारे सफ़र के थे ही नहीं
जो न आए हमारे दामन में
फल हमारे शजर के थे ही नहीं
वो नज़ारे जो हम से दूर रहे
वो हमारी नज़र के थे ही नहीं
साथ चलते किसी के हम कब तक
हम पराई डगर के थे ही नहीं
चल दिए छोड़ कर जो यार 'कँवल'
वो हमारे नगर के थे ही नहीं
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