Ghubaar Bhatti

Ghubaar Bhatti

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Ghubaar Bhatti shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ghubaar Bhatti's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
जल्वा-ए-हुस्न अगर ज़ीनत-ए-काशाना बने
दस्तरस शम्अ' को हासिल हो तो परवाना बने

दिल न होशियार रहे और न दीवाना बने
ये तमन्ना है कि ख़ाक दर-ए-जानाना बने

हुस्न ऐ हुस्न ये है तेरी करिश्मा-साज़ी
का'बा बन जाए कहीं और कहीं बुत-ख़ाना बने

होश और कश्मकश-ए-होश इलाही तौबा
वही होशियार है उल्फ़त में जो दीवाना बने

इस तमन्ना से मैं ऐ इश्क़ ख़जिल होता हूँ
दिल की तक़दीर कि वो हुस्न का नज़राना बने

हुस्न महसूस से है जल्वा-ए-मुतलक़ मतलूब
न सही का'बा तो दिल-ए-माइल बुत-ख़ाना बने

मय-परस्ती का मुअ'य्यन कोई मेआ'र नहीं
जिस का जो ज़र्फ़ हो साक़ी वही पैमाना बने

उन की सरशार निगाहों के तसद्दुक़ कहिए
हासिल-ए-कैफ़ जो पैमाना-ब-पैमाना बने

सोज़ उल्फ़त के ख़ुदा शम्अ' नहीं है न सही
फूँक इतना मिरी हस्ती को कि परवाना बने

साग़र-ए-दिल में है कैफ़िय्यत-ए-सहबा-ए-अलस्त
बूँद बूँद उस की न क्यूँ हासिल-ए-मय-ख़ाना बने

आप इक रोज़ तवज्जोह से जो सुन लें सर-ए-बज़्म
दिल की रूदाद का हर लफ़्ज़ इक अफ़्साना बने

आज मुझ को वो मय-ए-होश-रुबा दे साक़ी
और तो और दिल अपने से भी बेगाना बने

काश मिट मिट के मिरी हस्ती-ए-नाचीज़ 'ग़ुबार'
ख़ाक हो जाए तो ख़ाक-ए-दर-ए-जानाना बने
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Ghubaar Bhatti
अजब इंक़लाब का दौर है कि हर एक सम्त फ़िशार है
न कहीं ख़िरद को सुकून है न कहीं जुनूँ को क़रार है

कहीं गर्म बज़्म-ए-हबीब है कहीं सर्द महफ़िल-ए-यार है
कहीं इब्तिदा-ए-सुरूर है कहीं इंतिहा-ए-ख़ुमार है

मिरा दिल है सीने में रौशनी इसी रौशनी पे मदार है
मैं मुसाफ़िर-ए-रह-ए-इश्क़ हूँ तो ये शम्अ' राह-गुज़ार है

जिसे कहते हैं तिरी अंजुमन अजब अंजुमन है ये अंजुमन
कोई इस में सोख़्ता-हाल है कोई इस में सीना-फ़िगार है

ये असर है एक निगाह का कि मिज़ाज-ए-तब्अ' बदल दिया
जो हमेशा शिकवा-गुज़ार था वो तुम्हारा शुक्र-गुज़ार है

ये ज़रूरी क्या है कि हर बशर रहे नाम-ओ-काम से बा-ख़बर
मगर इतना जान चुके हैं सब कि तख़ल्लुस उस का 'ग़ुबार' है
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Ghubaar Bhatti
तसल्ली को हमारी बाग़बाँ कुछ और कहता है
गुलिस्ताँ से मगर उड़ता धुआँ कुछ और कहता है

बहम कुछ साज़िशें फिर हो रही हैं बर्क़-ओ-बाराँ में
हर इक ताइर से लेकिन आशियाँ कुछ और कहता है

समझते हैं ख़ुदा-मा'लूम क्या कुछ कारवाँ वाले
ज़बाँ में अपनी मीर-ए-कारवाँ कुछ और कहता है

न फूलो इस तरह से नग़्मा-ए-मुर्ग़-ए-ख़ुश-इल्हाँ पर
तुम्हें आवाज़ा-ए-बांग-ए-अज़ाँ कुछ और कहता है

मगर महरूम ज़ाहिद हो गया है गोश-ए-शनवा से
उसे बुत-ख़ाने में हुस्न-ए-बुताँ कुछ और कहता है

ये ख़ुश-फ़हमी कि कुछ समझे हुए हैं अंजुमन वाले
मगर हर इक से रंग-ए-दास्ताँ कुछ और कहता है

ठहर जा हाँ ठहर जा जाने वाले इस को सुनता जा
ब-हाल-नज़्अ' तेरा नीम-जाँ कुछ और कहता है

मुख़ालिफ़ उस के कुछ कुछ आ रही हैं दिल की आवाज़ें
मगर हम से हिजाब-ए-दरमियाँ कुछ और कहता है

न रहना चाहिए गुलशन में मरऊब-ए-ख़िज़ाँ हो कर
कि हम से आज रंग-ए-गुलिस्ताँ कुछ और कहता है
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Ghubaar Bhatti
मुझे किस तरह से न हो यक़ीं कि उसे ख़िज़ाँ से गुरेज़ है
जो नसीम-ए-सुब्ह-ए-बहार को मिरे गुल्सिताँ से गुरेज़ है

ये उबूदियत का है इक़तिज़ा कि उसी पे ख़म हो मिरी जबीं
ये ग़लत किसी ने है कह दिया तिरे आस्ताँ से गुरेज़ है

है अजीब क़िस्म की बद-ज़नी मुझे उस की कोई ख़बर नहीं
गुल-ओ-ख़ार को भी बहार में मिरे गुल्सिताँ से गुरेज़ है

कुछ अजब नहीं जो क़दम क़दम मिरे राहबर ही हों राहज़न
नहीं मुत्तफ़िक़ कोई फ़र्द जब मुझे कारवाँ से गुरेज़ है

मिरे दाग़-ए-दिल की ही ताबिशें हैं जमाल-बख़्श दिल-ओ-नज़र
यही बात है कि तमाम शब मुझे कहकशाँ से गुरेज़ है

ये शकेब से नहीं आश्ना इसे कुछ वफ़ा से ग़रज़ नहीं
यही राज़ है यही वज्ह है जो दिल-ए-तपाँ से गुरेज़ है

है तलाश-ए-वुसअ'त-ए-ला-मकाँ कि जहाँ पे कुछ हो सुकून-ए-दिल
हो जहाँ भी बंदिश-ए-आब-ओ-गिल मुझे उस मकाँ से गुरेज़ है

ये तज़ाद-ए-इश्क़ 'ग़ुबार' है कोई किस तरह से समझ सके
कभी पा-ए-बाज़ पे सर है ख़म कभी आस्ताँ से गुरेज़ है
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Ghubaar Bhatti
मिरे मुद्दआ-ए-उल्फ़त का पयाम बन के आई
तिरी ज़ुल्फ़ की सियाही मिरी शाम बन के आई

हुई काशिफ़-ए-हक़ीक़त ये ज़मीर-ए-मय-कदा की
मिरी बे-ख़ुदी जो दुर्द-ए-तह-ए-जाम बन के आई

तिरी इक अदा थी ये भी गुल-ओ-ख़ार को जगाने
जो नसीम-ए-सुब्ह-गाही का ख़िराम बन के आई

ये सबा की बे-रुख़ी थी सू-ए-आशियाँ जो गुज़री
न सलाम ले के आई न पयाम बन के आई

मिरे ग़म-कदे में फूटी जो शुआ' दाग़-ए-दिल से
वही इक चराग़-ए-ताक़-ए-सर-ए-शाम बन के आई

सर-ए-तूर जिस की जूया थी निगाह-ए-चश्म-ए-मूसा
वही इक झलक फ़रोग़-ए-लब-ए-बाम बन के आई

रुख़-ओ-ज़ुल्फ़ की तमन्ना मिरे दिल को मुज़्दा-बादा
मिरी सुब्ह बन के आई मिरी शाम बन के आई

है बहुत मुहाल इस का जो 'ग़ुबार' मा-बदल हो
मिरी तीरगी-ए-क़िस्मत मिरी शाम बन के आई
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Ghubaar Bhatti
तिरा मय-ख़्वार ख़ुश-आग़ाज़-ओ-ख़ुश-अंजाम है साक़ी
कि दिल में याद तेरी लब पे तेरा नाम है साक़ी

मुहीत दौर-ए-साग़र चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम है साक़ी
ग़ुलाम-ए-चश्म-ए-मैगूँ गर्दिश-ए-अय्याम है साक़ी

दिल-ए-नाकाम को उल्फ़त से तेरी काम है साक़ी
मोहब्बत बे-नियाज़-ए-इबरत-ए-अंजाम है साक़ी

ज़माने से अलग हो कर मुझे दुनिया-ए-उल्फ़त में
तिरा रुख़ रोज़-ए-रौशन ज़ुल्फ़ तेरी शाम है साक़ी

इसी में आ गई है खिंच के साक़ी रूह तक़्वा की
मता-ए-दीन-ओ-ईमाँ क़ीमत-ए-इक-जाम है साक़ी

ख़ुदा रक्खे तिरी ज़ुल्फ़-ए-मोअ'म्बर के तसव्वुर से
तख़य्युल मेरा अंबर-बेज़-ओ-अंबर-फ़ाम है साक़ी

ख़ुदारा इस तरफ़ भी इक निगाह-ए-लुत्फ़ हो जाए
मिरी हस्ती हमा हसरत हमा आलाम है साक़ी

हुए हैं दिल पे इस से मुन्कशिफ़ असरार हस्ती के
नवा-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना मुझे इल्हाम है साक़ी

शरफ़ तेरी ग़ुलामी का बड़ी मुश्किल से मिलता है
ज़हे-क़िस्मत जो तेरा बंदा-ए-बे-दाम है साक़ी

अज़ल से ता-अबद यूँही रहेगा ख़ाक-ए-मय-ख़ाना
'ग़ुबार'-ए-ख़स्ता-ओ-नाकाम जिस का नाम है साक़ी
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Ghubaar Bhatti
ज़बाँ साकित हो क़त-ए-गुफ़्तुगू हो
नज़र ही से बयान-ए-आरज़ू हो

जहाँ मैं हूँ वहाँ पर तू ही तू हो
जहाँ तू हो जहान-ए-रंग-ओ-बू हो

शहीद-ए-नाज़ यूँ ही सुर्ख़-रू हो
शफ़क़ मुँह पर हो दामन पर लहू हो

वफ़ूर-ए-यास ओ जोश-ए-इब्तिला में
ज़बाँ पर आयत-ए-ला-तक़नतू हो

जो रंग-ए-गुल से टपका है चमन में
न मेरी ही तमन्ना का लहू हो

हरीम-ए-का'बा से भी मोहतरम है
वो दिल जिस में कि तेरी आरज़ू हो

मआ'ज़-अल्लाह पस-मंज़र चमन का
न ऐ दिल यूँ असीर-ए-रंग-ओ-बू हो

नमाज़-ए-इश्क़ कुछ आसाँ नहीं है
जिगर के ख़ूँ से पहले तो वुज़ू हो

हूँ ख़ार-ए-राह तक गुलशन-ब-दामाँ
अगर तू ही मआल-ए-जुस्तुजू हो

'ग़ुबार'-ए-ख़स्ता उस कूचे से उठ कर
न क्यूँ आवारा हर सू कू-ब-कू हो
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