Jalal Aarif

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Jalal Aarif shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jalal Aarif's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
दूर रहते हुए नज़दीक-ए-रग-ए-जाँ भी रहे
दुश्मन-ए-दिल भी रहे दिल के निगहबाँ भी रहे

डूब जाते हैं किनारे भी कभी मौजों से
अहल-ए-साहिल ज़रा अंदाज़ा-ए-तूफ़ाँ भी रहे

उन का अंदाज़-ए-मोहब्बत भी निराला देखा
मुझ में शामिल भी रहे मुझ से गुरेज़ाँ भी रहे

मैं तिरे क़ुर्ब का वो दौर भुलाऊँ कैसे
तेरे गेसू मिरे शानों पे परेशाँ भी रहे

जिस पे लोगों को फ़रिश्तों का गुमाँ हो जाए
काश इस दौर में ऐसा कोई इंसाँ भी रहे

हम को मंज़ूर नहीं थी जो नुमाइश अपनी
बज़्म में मिस्ल-ए-चराग़-ए-तह-ए-दामाँ भी रहे

ग़म-ए-जानाँ का तअ'ल्लुक़ तो है दिल से लेकिन
हम वही हैं जो हरीफ़-ए-ग़म-ए-दौराँ भी रहे

दीदा-ए-दिल से मोहब्बत का तक़ाज़ा है यही
तिश्ना-ए-दीद रहे दीद का अरमाँ भी रहे

आज दामन में बस इक दौलत-ए-ग़म है 'आरिफ़'
उन की उल्फ़त में कभी बे-सर-ओ-सामाँ भी रहे
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Jalal Aarif
मुझे जिस्म-ओ-जाँ से न कर जुदा मुझे ज़ेहन-ओ-दिल से मिटा न दे
मुझे दे के क़ुर्ब का हौसला मेरी तिश्नगी को बढ़ा न दे

मिरी अज़्मतें मेरी रिफ़अतें तिरी देन ही तो हैं ऐ ख़ुदा
मुझे ला के बाम-ए-उरूज पर कहीं पस्तियों में गिरा न दे

मिरे हर क़दम पे तू रख नज़र मिरी राह का तू हो पासबाँ
मिरे नक़्श-ए-पा हैं यहाँ वहाँ कहीं कोई उन को मिटा न दे

ये फ़सील जिस पे खड़ा है तू ये फ़सील-ए-शहर-ए-ग़ुरूर है
मुझे ख़ौफ़ है यही हर घड़ी कोई इस फ़सील को ढा न दे

वो चराग़ जिस से है हक़ अयाँ वही होगा रहबर-ए-कारवाँ
कोई झोंका बाद-ए-सुमूम का इसे देख आ के बुझा न दे

मैं जफ़ा करूँ तू वफ़ा करे तू जफ़ा करे मैं वफ़ा करूँ
यही रस्म रस्म-ए-वफ़ा रहे इसे मेरे दोस्त भुला न दे

ऐ रफ़ीक़ 'आरिफ़'-ए-ख़स्ता-दिल है ये आख़िरी मिरी इल्तिजा
मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे मुझे इतनी सख़्त सज़ा न दे
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आदाब-ए-जुनूँ अहल-ए-नज़र भूल गए हैं
जीते तो हैं जीने का हुनर भूल गए हैं

क्या अहल-ए-सफ़र ज़ौक़-ए-सफ़र भूल गए हैं
रस्ते में हैं मंज़िल की ख़बर भूल गए हैं

ग़म भूल गए ग़म का असर भूल गए हैं
तुम क्या मिले हम ख़ुद को मगर भूल गए हैं

हिजरत के अज़ाबों में बसर ऐसी हुई है
इक उम्र से हम अपना नगर भूल गए हैं

दुनिया के ग़म अपनों के सितम वक़्त के तेवर
क्या क्या न मिरे दीदा-ए-तर भूल गए हैं

तूफ़ाँ पे ही रखते हैं नज़र अहल-ए-ज़माना
मौजों की सियासत को मगर भूल गए हैं

वो गर्मी-ए-हालात न ज़ेहनों में वो हलचल
क्या हादसे आना ही इधर भूल गए हैं

क्या बात थी क़ातिल से जो मंसूब हुई थी
मक़्तल में झुकाए हुए सर भूल गए हैं

गुलशन की फ़ज़ाओं में घुटन आ गई कितनी
हँसने की अदा तक गुल-ए-तर भूल गए हैं

जो डाल रहे थे कभी सूरज पे कमंदें
वो लोग उजालों का सफ़र भूल गए हैं

आग़ाज़-ए-सफ़र अपना किया हम ने जहाँ से
हम रख के वहीं ज़ाद-ए-सफ़र भूल गए हैं

तुम अगली शराफ़त का सबक़ फिर से पढ़ाना
इस दौर के इंसान अगर भूल गए हैं

'आरिफ़' मैं गिला किस से करूँ बे-असरी का
तालेअ' ही मिरे बाब-ए-असर भूल गए हैं
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जब भी ज़ुल्फ़ों को तिरे रुख़ पे बिखरते देखा
हो के शर्मिंदा घटाओं को गुज़रते देखा

दिल से चुप-चाप तुझे जब भी गुज़रते देखा
याद-ए-माज़ी का हर इक नक़्श उभरते देखा

कितने ख़्वाबों को शब-ओ-रोज़ बिखरते देखा
फिर भी इक पल न ज़माने को ठहरते देखा

बात कुछ उन की जवानी पे ही मौक़ूफ़ नहीं
चढ़ते दरिया को भी इक रोज़ उतरते देखा

आई वो रौशनी हालात के बाज़ारों में
अपने साए से भी हर शख़्स को डरते देखा

कोंपलें फूटी हैं शाख़ों पे नए मौसम की
जिस घड़ी जौर-ए-ख़िज़ाँ हद से गुज़रते देखा

बहर-ए-उल्फ़त में तसव्वुर ही कहाँ साहिल का
डूबने वाले को ही पार उतरते देखा

राहतें मौत हैं इंसान के हक़ में 'आरिफ़'
दिल की फ़ितरत को मसाइब में सँवरते देखा
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सफ़र हयात का अब मौत के सराब में है
हर एक साँस अभी पंजा-ए-अज़ाब में है

सुनाती आई है दुनिया जिसे अज़ल से वही
अधूरे इश्क़ का क़िस्सा मिरी किताब में है

हवा उड़ा के न ले जाए ये मता-ए-हयात
अभी तो बंद ये ख़ुशबू गुल-ए-हबाब में है

ये बोझ लाद के मैं और कितनी दूर चलूँ
सुना है शहर-ए-वफ़ा पर्दा-ए-सराब में है

शब-ए-फ़िराक़ की तन्हाइयों को डसने दो
कि महर-ए-सुब्ह अभी मेरे रोब-ओ-दाब में है

यही तो जज़्बा मुझे क़त्ल-गह में ले आया
वो बे-नक़ाब तो होगा जो अब नक़ाब में है

सज़ा वफ़ाओं की दी है ख़ता मुआ'फ़ हुई
ये उल्टी गिनती भी उन के अजब हिसाब में है

सवार तौसन-ए-हस्ती हूँ इस सलीक़े से
लगाम हाथ में 'आरिफ़' न पा रिकाब में है
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