मुसव्विरों ने हमें क्या दिया मुहब्बत से
ग़मों को मेरा ही चेहरा दिया मुहब्बत से
ग़मों को मेरा ही चेहरा दिया मुहब्बत से
किसी के प्यार को ठुकरा दिया था मैं ने भी
किसी ने मुझ को भी ठुकरा दिया मुहब्बत से
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तुम कर बैठे थे न जाने कितने वादे लफ़्ज़ों में
हम ने तुम से प्यार किया था सीधे-साधे लफ़्ज़ों में
Read Fullहम ने तुम से प्यार किया था सीधे-साधे लफ़्ज़ों में
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रोकिए उन को ना जाने दीजिए
प्यार से अब मुस्कुराने दीजिए
प्यार से अब मुस्कुराने दीजिए
इश्क़ को गहराई गर देना है तो
रूठिए और फिर मनाने दीजिए
रख दिए है बाम पे सारे दिए
ज़ोर आंधी को लगाने दीजिए
आप क्यूँ झट से गले लग जाते है
पहले हम को आज़माने दीजिए
चाँद में होगा इज़ाफ़ ए रौशनी
उन को पर्दा तो उठाने दीजिए
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वो शख़्स मेरे दिल से कब का चला गया
जैसे के जिस्म से ये साया चला गया
जैसे के जिस्म से ये साया चला गया
पत्तों की सरसराहट से ऐसा लगा मुझे
वो आया मेरे पास में बैठा चला गया
दरिया की मछलियां भी मुझे चाहने लगी
इक मर्तबा वो साथ मेरे क्या चला गया
अब पास से भी वो नज़र आता नहीं मुझे
वो दूर नज़रों से कुछ ऐसा चला गया
हँस हँस के जिस पे वार दी ख़ुशियाँ जहान की
फिर उस के बा'द ख़ुद पे मैं हँसता चला गया
ये सोचा हाथ उस का मैं थाम लूँ मगर
कमबख्त मेरे हाथ से मौका चला गया
वो कर रहा था हँस के वाद ए वफ़ा की बात
हर शख़्स महफिलों से उठता चला गया
माँ ने दुआएँ देकर "आलम" किया विदा
हर मुश्किलों से ख़ूब मैं बचता चला गया
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यूँ जाओ ना ऐसे तुम तड़पता छोड़कर मुझ को
तुम्हारे बा'द रख देगी ये दुनिया तोड़कर मुझ को
तुम्हारे बा'द रख देगी ये दुनिया तोड़कर मुझ को
अभी ख़ुशियों के सांचे में ढला ही था कि ये दुनिया
ग़मों की आँच देकर रख दिया है निचोड़कर मुझ को
तराशा क्यूँ इसे तुम ने के जब पारा ही करना था
क्यूँ तोड़ा है बताओ तुम ने ऐसे जोड़कर मुझ को
के अब शर्दी की ये रातों को वो कैसे गुज़ारेगी
जो सोती थी कभी कंबल की तरह ओढ़कर मुझ को
ज़माना हो गया बिछड़े, तमाशा देखिए "आलम"
वो हंस देती है तन्हाई में अब भी सोच कर मुझ को
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अब जनाज़े पे मेरे तुम को ना आना होगा
आखरी वा'दा बिछड़ने का निभाना होगा
आखरी वा'दा बिछड़ने का निभाना होगा
इक वही शख़्स ज़रूरी है जीने का मगर
है भुलाना भी ज़रूरी तो भुलाना होगा
ऐब को अपने छुपाकर जो बहुत तनते है
आईना उन के ज़मीरों को दिखाना होगा
जानता हूँ के ग़ज़ल ज़ख़्मों को कर देंगे हरा
उन की ख़ुशियों के लिए फिर भी सुनाना होगा
अब टपकता है मेरे कपड़ों पे वफाओं का लहू
आलमारी से तेरे ख़त को हटाना होगा
अब कहीं ग़लती से तेरा नाम न लब पे आए
इक ज़रा होंटों पे पैबंद लगाना होगा
दिल के हालात समझता है मेरे दर्दों का
अश्क आँखों से मगर फिर भी बहाना होगा
आप के हाल पे "आलम" ये बहुत रोते है
अब मुंडेरों से कबूतर को उड़ाना होगा
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