यूं जाओ ना ऐसे तुम तड़पता छोड़कर मुझको
तुम्हारे बाद रख देगी ये दुनिया तोड़कर मुझको
अभी खुशियों के सांचे में ढला ही था कि ये दुनिया
गमों की आंच देकर रख दिया है निचोड़कर मुझको
तराशा क्यूं इसे तुमने के जब पारा ही करना था
क्यूं तोड़ा है बताओ तुमने ऐसे जोड़कर मुझको
के अब शर्दी की ये रातों को वो कैसे गुज़ारेगी
जो सोती थी कभी कम्बल की तरह ओढ़कर मुझको
ज़माना हो गया बिछड़े, तमाशा देखिए "आलम"
वो हंस देती है तन्हाई में अब भी सोचकर मुझको
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