maqbul alam

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    मुसव्विरों ने हमें क्या दिया मुहब्बत से
    ग़मों को मेरा ही चेहरा दिया मुहब्बत से

    किसी के प्यार को ठुकरा दिया था मैनें भी
    किसी ने मुझको भी ठुकरा दिया मुहब्बत से
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    फ़लक के चाँद, सूरज और अंजुम से नहीं मिलते
    चमकते है मगर तेरे तबस्सुम से नहीं मिलते

    तुम्हारे चेहरे से ही हु-ब-हू ये मेल खाते है
    मेरी ग़ज़लें जो मेरे ही तरन्नुम से नहीं मिलते
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    तेरी तस्वीर ना हो सीने में
    क्या मज़ा ख़ाक ऐसे जीने में

    जाम हाथों में सामने तू है
    ऐसी मुश्किल हुई है पीने में
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    तुम कर बैठे थे न जाने कितने वादे लफ़्ज़ों में
    हमने तुमसे प्यार किया था सीधे-साधे लफ़्ज़ों में

    मैंने चाहा था लिखूँ मैं कुदरत की रंगीनी को
    बस तेरा ही नाम यहाँ पर आते-जाते लफ़्ज़ों में
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    रोकिए उनको ना जाने दीजिए
    प्यार से अब मुस्कुराने दीजिए

    इश्क़ को गहराई गर देना है तो
    रूठिए और फिर मनाने दीजिए

    रख दिए है बाम पे सारे दिए
    ज़ोर आंधी को लगाने दीजिए

    आप क्यूं झट से गले लग जाते है
    पहले हमको आज़माने दीजिए

    चांद में होगा इज़ाफ़ ए रौशनी
    उनको पर्दा तो उठाने दीजिए
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    वो शख़्स मेरे दिल से कब का चला गया
    जैसे के जिस्म से ये साया चला गया

    पत्तों की सरसराहट से ऐसा लगा मुझे
    वो आया मेरे पास में बैठा चला गया

    दरिया की मछलियां भी मुझे चाहने लगी
    इक मर्तबा वो साथ मेरे क्या चला गया

    अब पास से भी वो नज़र आता नहीं मुझे
    वो दूर नज़रों से कुछ ऐसा चला गया

    हँस हँस के जिसपे वार दी खुशियां जहान की
    फिर उसके बाद ख़ुद पे मैं हँसता चला गया

    ये सोचा हाथ उसका मैं थाम लूं मगर
    कमबख्त मेरे हाथ से मौका चला गया

    वो कर रहा था हँस के वाद ए वफ़ा की बात
    हर शख़्स महफिलों से उठता चला गया

    माँ ने दुआएं देकर "आलम" किया विदा
    हर मुश्किलों से ख़ूब मैं बचता चला गया
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    अगर ये दरिया समंदर में मिल गया सोचो
    गुरुर आने लगा मीठा दिल गया सोचो

    गले लगाते ही पागल खुशी से हो जाता
    महज़ हँसी से ही मेरे जो खिल गया सोचो

    अगर मैं चींखता तो वो वहीं पे मर जाता
    जो आज मेरी इन अश्कों से हिल गया सोचो

    ये दुनिया मुफ़्त में देगी बिला-ज़रूरत भी
    पुराना ज़ख़्म जो सीने का सिल गया सोचो
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    यूं जाओ ना ऐसे तुम तड़पता छोड़कर मुझको
    तुम्हारे बाद रख देगी ये दुनिया तोड़कर मुझको

    अभी खुशियों के सांचे में ढला ही था कि ये दुनिया
    गमों की आंच देकर रख दिया है निचोड़कर मुझको

    तराशा क्यूं इसे तुमने के जब पारा ही करना था
    क्यूं तोड़ा है बताओ तुमने ऐसे जोड़कर मुझको

    के अब शर्दी की ये रातों को वो कैसे गुज़ारेगी
    जो सोती थी कभी कम्बल की तरह ओढ़कर मुझको

    ज़माना हो गया बिछड़े, तमाशा देखिए "आलम"
    वो हंस देती है तन्हाई में अब भी सोचकर मुझको
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    ज़ख्मों पे मेरे लम्स के मरहम निकाल दे
    वरना तू जिस्म से मेरी ये दम निकाल दे

    मेरे ख़ुदा की रहमतें बच्चे में देखिए
    वो चाह ले तो एड़ी से ज़मज़म निकाल दे
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    अब जनाज़े पे मेरे तुमको ना आना होगा
    आखरी वादा बिछड़ने का निभाना होगा

    इक वही शख्स ज़रूरी है जीने का मगर
    है भुलाना भी ज़रूरी तो भुलाना होगा

    ऐब को अपने छुपाकर जो बहोत तनते है
    आईना उनके ज़मीरों को दिखाना होगा

    जानता हूं के ग़ज़ल ज़ख्मों को कर देंगे हरा
    उनकी खुशियों के लिए फिर भी सुनाना होगा

    अब टपकता है मेरे कपड़ों पे वफाओं का लहू
    आलमारी से तेरे ख़त को हटाना होगा

    अब कहीं गलती से तेरा नाम न लब पे आए
    इक ज़रा होंटों पे पैबंद लगाना होगा

    दिल के हालात समझता है मेरे दर्दों का
    अश्क आंखों से मगर फिर भी बहाना होगा

    आपके हाल पे "आलम" ये बहुत रोते है
    अब मुंडेरों से कबूतर को उड़ाना होगा
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