
फ़लक के चाँद, सूरज और अंजुम से नहीं मिलते
चमकते है मगर तेरे तबस्सुम से नहीं मिलते
तुम्हारे चेहरे से ही हु-ब-हू ये मेल खाते है
मेरी ग़ज़लें जो मेरे ही तरन्नुम से नहीं मिलते
— maqbul alam
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