ab janaaze pe mere tumko na aanaa hogaa | अब जनाज़े पे मेरे तुमको ना आना होगा

  - maqbul alam

अब जनाज़े पे मेरे तुमको ना आना होगा
आखरी वा'दा बिछड़ने का निभाना होगा

इक वही शख़्स ज़रूरी है जीने का मगर
है भुलाना भी ज़रूरी तो भुलाना होगा

ऐब को अपने छुपाकर जो बहोत तनते है
आईना उनके ज़मीरों को दिखाना होगा

जानता हूँ के ग़ज़ल ज़ख़्मों को कर देंगे हरा
उनकी ख़ुशियों के लिए फिर भी सुनाना होगा

अब टपकता है मेरे कपड़ों पे वफाओं का लहू
आलमारी से तेरे ख़त को हटाना होगा

अब कहीं ग़लती से तेरा नाम न लब पे आए
इक ज़रा होंटों पे पैबंद लगाना होगा

दिल के हालात समझता है मेरे दर्दों का
अश्क आँखों से मगर फिर भी बहाना होगा

आपके हाल पे "आलम" ये बहुत रोते है
अब मुंडेरों से कबूतर को उड़ाना होगा

  - maqbul alam

Ghayal Shayari

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