आहों को मेरे दिल से निकलने नहीं दिया

हाँ फिर भी आँसुओं को टिकने नहीं दिया

ली है तमाम रात मेरी करवटों ने जान
इक तेरी याद ने मुझे सोने नहीं दिया

उड़ जाती है सिलन से मकानों की ख़ूबियाँ
आँसू को आँख ने कभी रुकने नहीं दिया

जड़ बाप ने बना दिया मज़बूत इतना की
पेड़ों के शाख़ को कभी गिरने नहीं दिया

बेचैन उस को कर दिया हम ने तमाम रात
मिलने गए मगर गले लगने नहीं दिया

दिल चाहता था देख लूँ उस को पलट के मैं
लेकिन अना ने उस की पलटने नहीं दिया

— maqbul alam

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