रूहों को शमशान पकड़ के ले आई
दो जिस्मों को जान पकड़ के ले आई
कोई ना पहचान सका था मुझ को फिर
गज़लों की पहचान पकड़ के ले आई
मैं जाने वाला ही था की इक लम्हे में
तेरी इक एहसान पकड़ के ले आई
मेरे रब की रहमत जोश में आई तो
किस्मत इक मेहमान पकड़ के ले आई
उस को था गुमान डूबा देगा मुझ को
मां दरिया से कान पकड़ के ले आई
ख़ुशियाँ मीलों दूर खड़ी थी की "आलम"
बेटी की मुस्कान पकड़ के ले आई
— maqbul alam















