vo shaKHs mere dil se kab ka chala gaya | वो शख़्स मेरे दिल से कब का चला गया

  - maqbul alam

वो शख़्स मेरे दिल से कब का चला गया
जैसे के जिस्म से ये साया चला गया

पत्तों की सरसराहट से ऐसा लगा मुझे
वो आया मेरे पास में बैठा चला गया

दरिया की मछलियां भी मुझे चाहने लगी
इक मर्तबा वो साथ मेरे क्या चला गया

अब पास से भी वो नज़र आता नहीं मुझे
वो दूर नज़रों से कुछ ऐसा चला गया

हँस हँस के जिसपे वार दी ख़ुशियाँ जहान की
फिर उसके बाद ख़ुद पे मैं हँसता चला गया

ये सोचा हाथ उसका मैं थाम लूँ मगर
कमबख्त मेरे हाथ से मौका चला गया

वो कर रहा था हँस के वाद ए वफ़ा की बात
हर शख़्स महफिलों से उठता चला गया

माँ ने दुआएं देकर "आलम" किया विदा
हर मुश्किलों से ख़ूब मैं बचता चला गया

  - maqbul alam

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